Wednesday, August 25, 2010

अकेले शिकार तो शेर ही करते हैं


यहां किसी को ललकार कर युद्ध में शेर बनाने की बात नहीं चल रही है, क्योंकि एक दिन के शेर मेमने ही होते हैं, जो मैदान-ए-युद्ध देखकर पीछे की ओर भागते हैं, क्योंकि उन्हें मौत का भय रहता है। साहस एक दिन में पैदा नहीं होता और जिनका खून खून होता है, वो पानी कभी नहीं बनता। सूअर ही ग्रुप में शिकार करते हैं, शेर अकेला करता है। बस यही तो जीवन का दर्शन है, जहां जीना एक दुर्लभ है। क्या जीवन जीते हो, और क्या नहीं? सवालों के बादल घुमड़-घुमड़ के घूमते रहते हैं , कभी जिंदगी में यह गरजते हैं तो कभी बादल बूंदों के बाण बनाकर छलनी भी करते हैं, मगर तय यह करता है आप उसके सामने कैसे खड़े हो। जिंदगी सबको दी है, जाहिर है आप अपंग नहीं है, क्योंकि तब आपके पास बहाना होता। अब कोई बहाना नहीं चलने वाला। मगर फिर भी हम यह उलाहाने देकर सच्चाई की आंखों में धूल झोंककर साफ निकलना चाहते हैं। समुंदर की लहरे उन्हें ही सलाम करती हैं, जो उनके विरुद्ध चलते हैं, उन्हें नहीं जिसे वो ही फेंकती हैं। और जिसे वो फेंकती हैं, वह मुर्दा ही तो है। इस जीवन कश्ती में कुश्ती करनी पड़ती है और अगर एक भी दांव गलत चल गया तो जीवन की जंग हार जाते हैं। जीवन एक शतरंज है और इसे जीतने के लिए बुद्धि की जरूरत है, अगर तुममें दम नहीं है तो तुम्हें यहां से उखाड़कर फेंक दिया जाएगा। उन विरोधी और घमंडी अश्वों को काबू में करना है तो उस पर कोई बल का प्रयोग नहीं होगा, क्योंकि वहां तो वल्गाएं खींचने में जो माहिर है, बस वही उनका मालिक कहलाएगा। इतिहास के पन्नों का उधेड़े तो सबकुछ सामने आ जाएगा। फिर चाहे रामचंद्र की रावण विजय हो या फिर कर्ण का विश्वजीत बनना। मगर बुद्धि के साथ जीवन की वैतरणी में पार लगाना हो तो कृष्ण की तरह बनो, जो अर्जुन के सारथी बनकर गीता के सागर से उसे सुरक्षित लेकर आ गए। यह सिर्फ कृष्ण ही तो कर सकते थे। चालों की चपलता से इतिहास बदल जाते हैं और शहंशाहों के ताज मिट जाते हैं, सल्तनतें खाक में मिल जाती हैं तो फिर क्यों यह गर्व है, जिसमें झूठे आडंबर है, खोखला अहंकार है। अहंकार तो उस वैश्या में भी है जो जमीन की धूल है, लेकिन उस धूल को चांटने भी तो ताज पहनने वाले ही जाते हैं। मिथ्याओं का महल खड़ाकर उसमें ज्यादा दिनों तक रहा नहीं जा सकता, क्योंकि पहली आंधी तो वह बर्दाश्त कर भी जाएगा, लेकिन दूसरी आंधी तो उसे ढहाकर जाएगी ही। अब यहां से उम्मीदों की उड़ान को परवान चढ़ाना गलत है, यहां तो हवाएं भी कातिल हैं और लोग उस कत्ल के बाद लाशों से भी उगाही में जुट जाते हैं। जीवन से बेवफाई कर किसी के तलवे चांटकर अगर जीवन जीते भी हो तो निश्चय ही वह मृत है। माना की यह कलियुग है, लेकिन कोई भी युग हो खून और सिद्धांत तो नहीं बदलते। गैरत और रौब तो कम नहीं होता। यहां किसी को उद्वेलित करने का मन भी नहीं है, लेकिन जमीन पर रेंगने से अच्छा है कि जमीन से ऊपर उठो। यहां बहुत सारे केकड़े हैं जो तुम्हारी टांगे खींचेंगे, लेकिन उन्हें हराने की कोशिश तो करो। जीवन किसी के रहमोकरम पर पल रहा है तो क्या मतलब, कभी अपनी शक्ति और अस्तित्व को भी तो पहचानकर देखो। एक बार जीना तो सीखो...। जिस मां ने तुम्हें जन्म दिया है उसने तो कभी नहीं चाहा कि उसका लाल किसी के तलवे चांटे, सम्मान की बात एक तरफ, लेकिन पराधीनता वह भी मन से...शायद अंग्रेजों की पराधीनता तो फिर भी ठीक थी, लेकिन अब तो पराधीनता का स्वरूप ही बदल गया है। अब तो चमचो ने चांद को छूना सीख लिया है, लेकिन यह चांद खोखला है, क्योंकि वह किसी और का तलवा था, जिसे छूकर तुम यहां तक पहुंचे हो...। मत जियो यार ऐसी जिंदगी, अपने भीतर झांको, इस ईश्वर ने तुम्हें भी वो आवाज दी है, जिससे यलगार पैदा हो जाएगी। एक बार दहाड़कर तो देखो, दुनिया के कदम पीछे अपने आप चले जाएंगे।

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