Wednesday, December 29, 2010

जब हमसफर ‘हरामी’ हो जाए

कहते एक महिला के जीवन में कई बार परिवर्तन आते हैं, और वो परिवर्तन उसकी जिंदगी को संवार भी देते हैं और बिगाड़ भी। ये कैसे बदलाव हैं, इन पर गौर करें तो इन बदलावों में पुरुष अधिक प्रभावित नहीं होता है और न ही उसके जीवन में ऐसी कोई फांस आती है, वह जीवनभर जिस नदी में तैरता रहता है, उसे वहीं अपना जीवन निकालना होता है। मगर स्त्री के साथ ऐसा नहीं है, वह एक नदी, नहीं कई नदियों में जीवन बसर करती है, ऐेसे में कभी-कभी उस नदी के साथ उसके लिए वरदान बन जाते हैं तो कभी-कभी श्राप। कहते हैं जीवन स्वयं नहीं बिगड़ता है, बल्कि दूसरे लोग बिगाड़ देते हैं, जिन पर हम भरोसा करते हैं, वही जब भरोसे का कत्ल करते हैं, तो आसंू नहीं आते, बल्कि आदमी अंदर से ही टूट जाता है। फिर वह दोबारा खड़ा नहीं हो पाता है, उसकी जिंदगी की सारी उम्मीदें टूट जाती हैं और हौसलों की उड़ान हमेशा के लिए समाप्त हो जाती है। जब हम नदी में पत्थर मारते हैं तो वह थोड़ी उछलती है, लेकिन इसके बाद वह शांत हो जाती है, बस यही कहानी है समाज में स्त्री की। उसके जीवन में पहला मोड़ वह आता है जब वह अपने घर में रहती है, अगर माता-पिता सही हैं, तो वहां उसकी जिंदगी सुंदरम कहलाती है, इसके बाद सबसे बड़ा जो मोड़ है, शादी के बाद आता है। यहां अगर हमसफर शानदार रहे तो जीवन सुंदरम हो जाता है, लेकिन जब हमसफर हरामी हो जाए तो समझ लो पल-पल मौत से दो चार होना पड़ता है। आज के समाज में हालांकि स्त्री को उन्नति मिली है, लेकिन यह उन्नति का हिस्सा बहुत कम है, अब भी कई प्रतिशत महिलाएं अपनी पतियों के ठाठ को अपने मांग का सिंदुर सजा कर चल रही हैं। वह उनसे बात करने में कांपती हैं, वह उनसे कुछ कहने से डरती है। अपने पतियों की इच्छा वो अपनी तकलीफों को सहकर पूरी करती हैं। कभी-कभी दर्द से तड़पती रहती हैं, इसके बावजूद वो पति को कोई कष्ट नहीं होने देती हैं। इसके बावजूद वह निकम्मा पति शराब का शौकीन हुआ तो जीवन की गत और बुरी हो जाती है। क्योंकि शराब उस बुराई का नाम हैै जो आदमी को जिंदा लीलती है और इतने धीरे की खुद उसे पता नहीं पड़ता। हां वह जानता है कि उसे क्या करना है, लेकिन मजबूरी रहती है उसकी। क्योंकि उसके मोहपाश में वह उलझा रहता है, और इससे छुटकारा उसे नहीं मिलता है। यह मोड़ महिला को जीवन भर की टीस देता रहता है, यहीं से उसकी और उसके उम्मीदों का दामन टूटता है। आडंबर भी हौसलों से बढ़कर होता है, इन हौसलों को यह शराब लील जाती है। उस महिला का दमन होता है, उस दमन का दर्द उसके सीने को छलनी करता रहता है। इसलिए इन्हें बचाना बहुत जरूरी होता है। अब सवाल उठता है कि महिला सशक्त कैसे बने, क्योंकि हमसफर हरामी है, तो यहां पर मां-बाप की जिम्मेदारी बहुत बढ़ जाती है, अगर वो बिलकुल ध्यान से और चुनकर अपनी बेटी की जिंदगी उसे सौंपे जो वास्तव में इंसान हो। जीवन से प्यार करता हो, धुएं में जिंदगी को उड़ाता न हो। वह उससे भी प्यार करे, जो उसे बहुमूल्य चीज दी जा रही है, अब निर्णय आप पर है, क्या आप अपनी बेटी की जिंदगी को जन्नत में देना चाहते हो, या फिर उसे जहन्नुम बनाना चाहते हो। आपकी एक गलती उसके जीवन को बर्बाद कर देती है।

Monday, December 27, 2010

मौत की ‘गुजारिश’


गुजारिश देखने से पहले तक मैं आत्महत्या या इच्छामृत्यु को बहुत ही बकवास या कहें कि कमजोर लोगों का हथियार समझता था। शायद आज भी समझता हूं, लेकिन अब थोड़ा सा फर्क आ गया है। इस महीन अंतर को कैसे दूर करें, यह तो साफ है, लेकिन सवाल यह भी है कि क्या मौत की गुजारिश सार्थक चीज है या फिर यह भी पाप की श्रेणी में ही आता है। जिस तरह फिल्म ‘क्योंकि’ में हमने देखा सलमान की तकलीफ जेकी से सहन नहीं होती है, इसलिए वह उसे मार देता है। इस सब्जेक्ट पर कई फिल्में बनी हैं। हाल में बनी ‘गुजारिश’ ने मौत की इस गुजारिश पर एक नई बहस छेड़ दी है। क्या तकलीफ में रह रहे लोगों को इच्छामृत्यु दे देनी चाहिए, या फिर यह कत्ल की श्रेणी में आता है। यह कानून तो अभी तक तय नहीं कर पाया है, और न ही कोई डॉक्टर अपने मरीज के साथ भी ऐसा करने की हिम्मत रखता है। मगर इसका सॉल्यूशन क्या? हमारे धर्मों की बात की जाए तो यहां पर लिखा है कि जो भी तकलीफ में हो, उसकी मदद की जानी चाहिए। मदद की सीमारेखा भी है क्या? अगर कोई मरीज इतनी तकलीफ में है कि उससे जीवन जीते ही नहीं बन रहा है तो फिर क्या उसे यूथेनेशिया दे देना चाहिए। कानून इसकी आज्ञा नहीं देता है। अब उन लोगों को क्या ऐसे ही तकलीफ में डाल दिया जाए, जो एक बार मरने की बजाय पल-पल मरते हैं। उन्हें यूं ही तड़पने के लिए छोड़ दिया जाए। मानवता तो यह करने नहीं देती, लेकिन मानवता की बात की जाए तो वह इसकी इजाजत भी नहीं देती है कि उसे मौत दी जाए। तो फिर इस समस्या का हल क्या? फिल्म गुजारिश में बहुत ही बेहतर तरीके से इस बहस को छेड़ा गया है, जिसमें सफल नायक बाद में इच्छामृत्यु मांगता है, लेकिन कानून उसकी मदद नहीं करता। हालांकि नायिका ने यह साहस भरा कार्य जरूर यिका है, अपने ही सुहाग को उजाड़ा उसने, लेकिन उसे इसका मलाल नहीं रहता है, क्योंकि वह उसके चौदह साल की तड़प को मिटाती है। उसे मुक्ति देती है। यह भी तो नेक काम है। सवाल जीने मरने का नहीं है, इच्छामृत्यु को शामिल किया जाना चाहिए, क्योंकि बीमारी या हादसे पर किसी का वश नहीं होता है। जब डॉक्टर भी लाचार हो जाते हैं तो मरीज के पास सिवाय तड़पने और कराहने के और कुछ नहीं बचता। उस समय उसके जीवन में सिफ अंधेरा ही अंधेरा रहता है। उसे न तो कोई रोशनी दे सकता है, और न ही कोई चमत्कार जैसी चीज होती है। जीवन उसका बच भी जाए तो वह किसी काम का नहीं होता है, क्योंकि वह पूरी तरह से अपंग या नाकाबिल हो चुका होता है। ऐसे में अगर इस दर्द को कम करने के लिए वह इच्छा जताए तो उसकी इस मंशा या गुजारिश पर विचार जरूर किया जाना चाहिए। सालों तड़पने की बजाय वह सिर्फ कुछ घंटे ही तड़पे और फिर उसे इस मोहजाल और मृत्युजाल से छुटकारा मिल जाए। उस मरीज के लिए भी कितना सुखद छण रहेगा, क्योंकि उसे जीवनमुक्ति मिल जाएगी। इस चक्रव्यूह का हल अभी निकलता नहीं दिखाई दे रहा है, लेकिन समाज के सामने यह नई बहस पर हर कोई मंथन कर रहा है और आखिर निर्णय क्या हो ? इस बहस में शामिल हो गए हैं। निश्चय ही इस पर बहस होनी चाहिए, और इसके परिणाम तक भी आना जरूरी है, क्योंकि किसी के कष्टों का निवारण होगा तो एक तरह से यह समाजसेवा ही तो हुई, लेकिन इस ‘गुजारिश’ को अभी कई पेंच हैं।

Sunday, December 26, 2010

उमा की ललकार


उमा के कितने रंग...शायद कोई नहीं जानता। खुद बीजेपी भी नहीं। बार-बार बीजेपी को उमा के नए नए चमत्कार देखने को मिल रहे हैं, इन चमत्कारों से लोग परेशान हैं। उमा की इस ललकार का उनके पास कोई जवाब भी नहीं है...इस सन्यासिन से पूरी बीजेपी पस्त हो गई है। पस्त इसलिए क्योंकि, ये कब कोैन सी चाल चल देते हैं, और कब धोखा दे जाती हैं, कोई नहीं जानता। जिस तरह से बौखलाकर या कहें कि बागी बनकर उन्होंने बीजेपी का साथ छोड़ा था और ताव शाव में उन्होंने एक नई पार्टी की बुनियाद भी रख दी थी, लेकिन वो सभी बीती बातें हो गई थीं। बीजेपी को ताज भी उमा ने ही दिलवाया था । हां, यह अलग बात है कि उस समय दिग्विजय के विरोध में कोई भी खड़ा होता तो जीत जाता, लेकिन बदलाव की बयार ने पलटी ली, और उमा-बीजेपी का साथ छूट गया। मनाने का दौर भी चला, लेकिन गुस्सैल सन्यासिन नहीं बदली। आडवाणी से लेकर अटल तक ने उन्हें मनाने की कोशिश की, लेकिन उन्होेेंने नहीं मानी। फिर उमा ने बीजेपी से माफी मांगने की पेशकश की, उन्होंने कहा कि मैं वापस बीजेपी में आना चाहती हूं। बड़े नेताओं ने कहा कि उमा वापस आ सकती हैं, और उन्हें आना चाहिए, लेकिन कुछ कारणों से नहीं आई। पिछले एक साल से कवायद हो रही है कि उमा बीजेपी में आने वाली हैं। इससे बीजेपी के कई सिकंदरों के कान खड़े हो गए थे। कानाफूसी का दौर चला, किसी ने कुछ कहा तो किसी ने कुछ। लेकिन एक बार फिर उन्होंने नागपुर में ऐसा बयान दे डाला, जिसने यह बता दिया कि मुंह पर काबू नहीं है उमा का। यह सन्यासिन अब परिपक्व मानी जाती है, लेकिन वह किसी से नहीं डरती और अपनी बात बड़ी निष्पक्षता के साथ कही भी। दुनिया बदल रही है और महिलाओं को संबल भी मिला है, और इन सबमें बीजेपी अभी तक उबर नहीं पाई। वह अभी भी गर्त में पड़ी हुई है और उसे सामने से समुंदर की तूफानी लहरें आती नजर आ रही हैं, सवाल का रेतीला तूफान उसे बार-बार छलनी कर जाता है, ऐसे में उमा का हथियार बीजेपी को नई चेतना दे सकता है। इस सन्यासिन की पूजा काम आएगी। यह बीजेपी ने कई बार सोचा, लेकिन हालात फिर परिवर्तन हो गए हैं। एक बार फिर बीजेपी में सुगबुगाहट का दौर चल रहा है, गुफाओं से रोशनी चीर कर आ रही है। और एक पत्थर पर टिमटिमा रही है, वह पत्थर भी कभी कोहिनूर बन जाएगा, न भी बना तो एक चमक का मकसद जरूर छोड़ जाएगा। सनसनाती हवाएं जब आसमां से उतरती हैं, तो ठंड की परी आती है, धीरे से बदन में कंपकंपी दे जाती है। बीजेपी का भी यही हाल है, वह एक अहसास को लेकर जी रही है और हो हल्ला में बढ़ावा देने को मजबूर है। देखा जाए तो जिस तरह से बीजेपी और उमा का चेप्टर अभी तक नहीं थम रहा है, बुनियाद में ही त्रिकोड़ आ गया है, इस त्रिकोड़ में क्या उमा अपना रंग भर पाएंगी, क्योंकि जिस तरह से बयान देकर वो बुलंदी पर हैं, वह उन्हें तो मजबूत कर रहा है, लेकिन मतभेद की खाई में कई उबाल आ रहे हैं। और इस उबाल को कौन रोकेगा, जाने...? जिस तरह से उमा और बीजेपी में चक्रव्यूह की उलझन बढ़ी है, आज अगर दोनों का गठजोड़ होता है तो निश्चय ही पार्टी में दो धड़ भी हो सकते हैं, हो सकता है कि वर्चस्व की लड़ाई हावी हो जाए...और आखिर कब तक लड़ाई में लड़ाके भिड़े रहेंगे, या तो अब उमा आएंगी या फिर बीजेपी अपने उसी रौब पर रहेगी, लेकिन जो इसके रंग में परिवर्तन आया है। वह विरोधियों के लिए काफी राहत की बात है, पार्टी अब क्या रणनीति अपनाएगी, या फिर उसी रुतबे के साथ आएगी, यह तय तो जनता करेगी, लेकिन उमा के बवालों के बुलबुले अभी और उठेंगे।

Thursday, December 23, 2010

आसमान में सचिन सितारा भी है


सवाल बड़ा अजीब है कि क्रिकेट की दुनिया में महान कौन सा बल्लेबाज है...यहां महान की तलाश नहीं करनी चाहिए, बल्कि सर्वश्रेष्ठ की तलाश करनी चाहिए। सर्वश्रेष्ठ हो सकते हैं, लेकिन टीम में महान कैसे? इस बहस को यहीं रोकते हुए हम तलाश करते हैं सर्वश्रेष्ठ की, वह भी क्रिकेट में। चलो मान लें अर्थात् क्रिकेट में कौन बेहतर है, सचिन तेंदुलकर, सौरव गांगुली, सर डॉन ब्रेडमैन, ब्रायन लारा, रिकी पॉटिंग या फिर कोई और। जब से क्रिकेट शुरू हुआ है, यह बहस तब से शुरू है। क्रिकेट में कौन कितना दिग्गज है, कौन कितने पानी में और किसने कितने मौकों पर श्रेष्ठता दी है, यह आंकलन करना बहुत मुश्किल है। जिस तरह से टीम इंडिया का सरताज, सचिन तेंदुलकर आज क्रिकेट का सितारा बनकर चमक रहा है। यह वह कोहिनूर है, जो अपनी रोशनी से क्रिकेट के मैदान को जगमगा रहा है। तो क्या कह दिया जाए कि सचिन रमेश तेंदुलकर दुनिया के सर्वश्रेष्ठ बल्लेबाज हैं। सौरव गांगुली अपने ही खेल के लिए जाने जाते थे, उनकी आक्रामक शैली उन्हें उनके फैंस में लोकप्रिय बना रखी थी। उनके चहेते सचिन से ज्यादा थे। वह बालकनी से शर्ट उतारकर लहराना, उस पल को शायद ही कोई भारतवासी भूल पाएगा। हां शर्ट तो धोनी ने भी उतारी थी, जब उन्होंने विश्वकप जीता था, लेकिन उनमें वह बात नहीं थी। वह इतने खास नहीं लगे, जितने दादा लगे थे। बात आगे बढ़ाते हैं, तो क्या रिकी पॉटिंग जो आॅस्टेÑलिया टीम की धार हैं और उन्होंने टीम को तीन दो क्रिकेट वर्ल्डकप जितवाएं हैं। उन्हें श्रेष्ठ करार देना चाहिए। वैसे कई लोग सचिन से उनकी तुलना करने का जोखिम जरूर उठा लेते हैं, लेकिन उन्हें एक ही जवाब दे दिया जाता है, जिससे सुनकर वो लोग चुप हो जाते हैं। सचिन को रिकी से आगे रखा जाता है। इसके बाद बात आती है ब्रायन लारा का। यह लारा का...अदम्य कद का है। यह कद कितना बड़ा है, जिसे देखकर हर कोई एक बार अपने कद पर नजर भी डालता है। तो फिर कौन है महान...स्वॉरी सर्वश्रेष्ठ। आखिर किसे दिया जाए यह ताज। इस ताज में कांटे भी हैं और कई बुराइयां भी। क्योंकि इसमें आरोप भी मढ़े जाएंगे, वह आरोप रहेंगे कि ये श्रेष्ठ नहीं हैं, इसके बावजूद ताज पहनने की उम्मीद जरूर होगी। अब भारतीय के संदर्भ में बात कि जाए तो हमारे दिल तो मां की तरह होते हैं, बेटे में सैकड़ों कमियां होने के बावजूद दुनिया में सबसे अच्छा लगता है। हमारे खिलाड़ी कितने ही मौकों पर हमें निराश क्यों न कर दें, लेकिन जब बात पक्ष लेने की आएगी तो फिर ये लोग किसी की सुनने वाले नहीं हैं। अपने क्रिकेटरों को ही आगे बढ़ाएंगे। वो तो सचिन, सौरभ और राहुल को ही दुनिया के पहला बल्लेबाज करार देंगे। न कोई सर, न कोई रिकी...यहां तो हिंदुस्तानियों की ही चलती है और अगर एसमएस के जरिए यह पता लगाया जाए कि दुनिया का कौन सा बल्लेबाज महान है, तो निश्चय ही हम एसएमएस में भी जीत जाएंगे। अब यह तो अति प्यार और अति पागलपन भी हो सकता है, लेकिन हम तो सचिन को ही शिखर पर कहेंगे। हां दुनिया में यह बहस जरूर रहती है, जिसमें सचिन को ब्रेडमैन के पीछे रखने की साजिश अंग्रेजों की है, लेकिन देखा जाए तो सचिन से बेहतर मैन भी नहीं थे। सचिन का खेल देख लें, क्रिकेट की हर कला में वह पारांगत है, फिर चाहे टेस्ट हो या वनडे। ट्वेंटी-20 में भी हमने उनके जलवे देखे हैं, कोई उनके नकार नहीं सकता है। कोई यह नहीं कह सकता है कि हमारे सितारे में कम चमक है। सचिन तो आसमान का तारा है, अब उसकी चमक से जग जगमगा रहा है।

Wednesday, December 22, 2010

बयानों से तूफान नहीं आएगा


यह बात हम नहीं कह रहे हैं, बल्कि बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी कर रहे हैं। एक बार फिर बयानों को की आंच से चाय को उबाल रहे हैं, सोच रहे हैं कि इसमें बिना दूध डाले इसे सफेद कर लिया जाएगा, लेकिन यह सिर्फ कोरी कल्पना है, क्योंकि जब तक चाय में दूध नहीं डालेंगे वह काली ही रहेगी। आरोप का आडंबर कितना ही खड़ा कर लो, जब जनता का दरबार सजता है, तो वह सच्चाई उजागर कर ही देता है। यहां नितिन भले ही कितनी ही निर्लज्जता साबित कर दें, कांग्रेस को चोर कह दें या खूनी। जनता तो उनके बयानों को हवा ही मानेगी। क्योंकि बीजेपी सिवाय आरोप लगाने के और कुछ भी नहीं कर रही है। अगर भ्रष्टाचार पर कांग्रेस को वह घेर रही है तो इसके पीछे कौन दोषी है, यह पूरी जांच की जाए। सवाल यह उठता है कि अगर टूजी में कांग्रेस सरकार फंसी है तो आग के छींटे एनडीए सरकार तक भी गए हैं और जब तेजाब के छींटे जाते हैं तो यह सिर्फ छींटाकशी तक ही सीमित नहीं रहते हैं, बल्कि जहां भी गिरते हैं, वहीं से मांस लेकर बाहर आ जाते हैं। बयानों की बाढ़ एक बार फिर लाई जा रही है और इस कल्पना की बाढ़ में बीजेपी कांग्रेस को डुबोना चाह रहेगी, लेकिन होगा बिलकुल उलट, जब बाढ़ आएगी तो वह यह नहीं देखेगी कि सामने कांग्रेस है या फिर भाजपा। दोनों इसमें बह जाएंगे, या फिर वही बचेगा जिसका किला मजबूत होगा। अभी की स्थिति में देखा जाए तो कांग्रेस का किला बहुत ही मजबूत दिखाई दे रहा है, बीजेपी तो सिकंदरों से परेशान है, यहां पर हर कोई हॉफ राबिनहुड और तीस मार खान बनने की जुगत में भिड़ा हुआ है। आखिर कब तक इस डंडे से रेलगाड़ी को हांकने की कोशिश की जाएगी। आडवाणी भी उबल रहे हैं, आखिर करते क्या? बेचारे बुजुर्ग नेता का ख्वाब पूरा होता नजर नहीं आ रहा है, सोचा था प्रधानमंत्री बन जाएंगे, लेकिन जिस तरह से पार्टी को हार की हताशा मिली है, वह उससे अभी तक उबर ही नहीं पाए हैं, हां आज कुछ बयान देखकर उन्होंने जताया है कि मुझे कम मत आंकों, मेरे अंदर अभी भी आग है, मैं अभी भी बूढ़ा नहीं हुआ हूं। जो कुछ कहना था उन्होंने भी ऊलजलूल कहा, लेकिन अंत में फैसला तो जनता जर्नादन के हाथ में ही है। और आज की जनता काफी जागरूक हो गई है, वह किसी भी कीमत में हरल्लों और मुंह के तीखों को नहीं रखेगी, हां उसे मीठों से भी नफरत है, लेकिन इतनी भी नहीं। खैर जो हो रहा है वह किसी हादसे से कम नहीं है, क्योंकि पूरी तरह से विपक्ष अपने कर्त्तव्यों से विमुख हो गया है, वह सिर्फ सत्तासीन होना चाहता है और इसके लिए वह सत्तादल को बदनाम करने की पुरजोर कोशिश कर रहा है। कौन इस खेल में हारेगा और कौन जीतेगा, इसमें तो अभी फैसला आना बाकी है, लेकिन बीजेपी जिस तरह से यह कारनामे करने में जुटी है, वह अपवाद साबित हो सकता है, क्योंकि आज का युवा सिर्फ विकास की राह पर चलना जानता है, उसी की बातें सुनता है, जो इससे हटकर बातें करता है, वह लोगों को नहीं भाता है। बहुत हो गया भ्रष्टाचार, महंगाई या अन्य मुद्दे, अब सब बोर हो गए हैं, कुछ नया चाहिए। ये दिल मांगे मोर...लेकिन गोलमोल कुछ नहीं चलेगा, गोलमाल से तो लोग सिर्फ हंसते हैं, अब तो उन्हें तथ्यपरख चीज चाहिए, और अगर ऐसा देने में बीजेपी असमर्थ साबित होती है तो निश्चय ही उसके हाल पुन: वही हो जाएंगे। जिस तरह से आम आदमी अपनी समस्याओं फंसा हुआ है, वो नेताओं के नाम से ही चिढ़ने लगता है, और इनके गंभीर भाषण उसे सोचने पर मजबूर नहीं करते, बल्कि उसे हंसी दिलाते हैं। वह साथियों के साथ खूब ठहाके लगाता है। क्योंकि आजकल तो बयान सिर्फ ठहाके लेने के लिए ही बचे हैं।

Sunday, December 19, 2010

धर्म, अपराध और सेक्स


आज हम इन तीन शब्दों पर बात करने वाले हैं, यह तीन शब्द हैं धर्म, अपराध और एस। इन तीनों में जीवन का सार छिपा है, अगर देखा जाए तो जीवन का प्रयाग भी यही है और अंत भी यही। सार भी यही है और तत्व भी। हम जाने अनजाने कितने ही बेगाने क्यों न हो जाएं, जीवन से कितना ही क्यों न कट जाए, हम इन तीनों में से एक के आसपास जरूर रहते हैं, फिर चाहे वो धर्म हो या अपराध या फिर एस। आप सोच रहे होंगे कि हम तीनों शब्दों को एक लड़ी में पिरोने की कोशिश क्यों कर रहे हैं, सवाल बेहतर है, क्योंकि हमें फितूर ही ऐसा चढ़ा है। भला तीनों में अंतर जमीन आसमान जैसा है। यहां आसपास इनके कोई भी एलिमेंट एक-दूसरे कहीं मेच नहीं हो रहे हैं। जी हां आपने सही सोचा, लेकिन जीवन एक चक्र है और सदा घूमता रहता है, यह इन तीन के इर्द-गिर्द ही नजर आएगा। मैं कई महात्माओं से मिला, कई अपराधियों से मिला और कई सेक्स वर्करों से भी। तीनों में मुझे कोई अंतर नहीं मिला। तीनों अपने-अपने काम में सुखी हैं। और पूरी शिद्दत से उसे करने में जुटे हुए हैं। क्या है यह...जीवन क्या चार पहियों की जगह इन तीनों पर आकर अटक गया है, यह भी बड़ा सवाल है, सवाल यह भी है कि क्या सागर से भी गहरे जीवन की गहराई इन तीन शब्दों से बढ़कर नहीं है। क्या आसमान से भी अधिक ऊंचाई है इनकी। अब तक आप सोच रहे होंगे कि मैं सिर्फ इनके बारे में कहकर बहलाने की कोशिश में जुटा हुआ हूं। तो यहां मैं साफ करना चाहता हूं कि हम बहुत ही गंभीर और संवेदनशील मुद्दे पर विचार और मंथन कर रहे हैं। क्योंकि जीवन का यही सार है, जिसका दायरा इन तीन शब्दों में आकर सिमटता है। सिमटन कई और भी हो सकती हैं, लेकिन इन्हें इन तीन शब्दों ने अपने दामन में ऐसा बांध रखा है कि कोई भी इसके विपरीत जा भी नहीं सकता। तीनों की प्रवृत्ति बिलकुल अलग है, जो धर्म से नाता रखता है, उसे जीवन संसार से कोई लेना- देना नहीं होता है। उसका सबसे पहले पल्ला छूटता है तो वह अपराध और सेक्स से। धर्म को पूरी तरह तभी पाया जा सकता है, जब इन दोनों का पूर्ण रूप से त्याग कर दिया जाए। बिना त्याग इसके शील का भांपा नहीं जा सकता है। वहीं जो अपराध में राज कायम करता है, उसमें अपना धैर्य लगाता है, वह धर्म को सर्वप्रथम त्याग देता है, उसके दिलोंदिमाग में धर्म जैसी कोई भी छोटी सी चीज भी नहीं होती है। इसके आगे और चलते हैं, वह यह कि सेक्स, अपराध का साथी हो सकता है, लेकिन जो पूर्ण धर्म को मानते हैं, वह इनसे बहुत दूर चले जाते हैं। या कहें कि इनके संगम की कोई धारा कहीं भी नहीं मिलती है, ये समानांतर चलते जाते हैं। आडंबर का तिरपाल यहां नहीं चल पाता है, क्योंकि वह इनके आगे टूट-फूट जाता है। बारिश की हवा में इसमें कई छेद हो जाते हैं और पानी टिप-टिप बूंदों के प्रखर स्वर से नीचे आने लगता है। अपराध सेक्स और धर्म की यह नई व्याख्या जीवन को नया अवतार देती है, अब यह प्राणी पर निर्भर करता है कि वह किस क्षेत्र में है और उसका उद्देश्य क्या। हालांकि तीनों में पहचान और ख्याति का फर्क काफी पड़ता है और कुछ में तो जीवन भी बर्बाद हो जाता है। धर्म की गाथा बहुत बड़ी है, और अपराध की दुनिया बहुत ही लुभावनी और क्षणिक होती है। सेक्स की दुनिया इन दोनों से बहुत अलग है, जो जीवन में एक नया आक्रोश भी पैदा करती है और एक सुकून भी देती है। बदलते दौर में इन्हीं तीन स्वीकृतियों पर जीवन का पहिया रगड़ रहा है।

Thursday, November 18, 2010

महत्वकांक्षी इंदिरा, त्यागशील सोनिया


देश आजाद हुए लगभग तीन दशक हो चुके थे, जो उतार चढ़ाव आजादी के पहले आए थे और उसके बाद वो कम होने लगे थे, लेकिन सत्ता का मद तब भी परवान पर था। इसका मोह नहीं छूट रहा था। महत्वकांक्षा की चाहत आसमान पर थी और पांव जमीन पर रहे, इसके लिए दूसरों के हाथों को बांधा जा रहा था। इतिहास चाहे जो भी रहा हो, लेकिन गुड़िया अब बड़ी हो गई थी। अब वह कठोर भी थी और अपने निर्णयों से दूसरों को पानी भी पिला सकती थी। उसने सादगी से शुरुआत की तो आक्रामक तेवर तैयार किए। फिर उसने उन्हें भी सबक सिखाया जो उसके दल में ही रहकर दलदल बना रहे थे, जब लगा की ये उन्हें ही डुबो देंगे तो फिर उसने वह कदम उठाया, जो अब तक के इतिहास में आज तक नहीं हुआ। हालांकि मुद्दे पर नजर डाले तो इमरजेंसी के कारण क्या था यह मायाजाल है। इमरजेंसी का डेÑगन ने जहां 18 महीने लोगों को डराते रहा, वहीं इंदिरा को भी ऐतिहासिक हार मिली। उस समय उनके तर्क यह थे कि सांप्रदायिक ताकतें एक हो रही थीं, ऐसे में उनके सामने यह एक आॅप्शन था। अगर वह ऐसा न करते तो देश में विद्रोह हो जाता। अंगुली उठाने वालों ने खूब अंगुली उठाई, विरोधियों ने इमरजेंसी को भयानक बताते हुए जनाधार अपने पक्ष में लिया। लेकिन क्या आप जानते हैं कि जब इंदिर का अहसास हुआ कि इमरजेंसी लगाकर कहीं न कहीं लोकतंत्र के साथ खिलवाड़ हो रहा है, या संजय के कुछ कार्यों के कारण लोकतंत्र बदनाम हुआ है तो उन्होंने चुनाव की घोषणा कर दी। चुनाव की यह चुनौती दोनों पक्षों के सामने थी। हर कोई इसे भुनाना चाहता था। इंदिरा भी मैदान में थी और विरोधी भी। इस बार उन्होंने इंदिरा को हरा दिया। पूरी सत्ता को कब्जे में ले लिया। लेकिन विरोध जताना तो आसान होता है, देश चलाना उतना ही पेचिदगी भरा होता है, इसमें वो नाकाम हो गए , 13 महीने ही सरकार चला पाए, इसके बाद गिर गए। फिर सत्ता में आई कांग्रेस। उसने देश को एक नया जनाधार दिया। लोगों ने पूरी शिद्दत से इंदिरा की गरीबी हटाओ और कई चीजों पर बेहतरीन रिस्पॉस दिया। इसी बीच पंजाब में एक ऐसी अनहोनी हो गई , जिसके बारे में किसी ने सोचा भी नहीं था। वहां सिख समुदाय पूरी तरह से भड़क उठा था। इस पर मजबूत इरादों वाली इंदिरा ने आॅपरेशन ब्लू स्टार चलाया। इस ब्लू स्टार आॅपरेशन ने तीन दिनों के भीतर वहां से अशांति को दूर किया। हालांकि इस दौरान कुछ सिखो को उन्होंने रुसवा कर दिया। यह लगातार जारी रहा। इसके बाद उन्होंने उनसे माफी भी मांगी, लेकिन दर्द दिल में दबाए बैठे थे, और कहते हैं कि जहां दुश्मन कुछ नहीं कर पाता है, वहां विश्वास को घात फुसलाकर उसे अपने में मिला लेता है और वहां से जन्म होता है विश्वासघात का। उन्होंने अपने अंगरक्षक में सिख को रख रखा था। उन्हें उनके सलाहकारों ने चेताया भी था कि अभी सिख उनके विरोध में हैं, इसलिए हटा दो उसे...लेकिन विश्वास को उन्होंने अतिविश्वास में परिवर्तित कर दिया और फिर इंदिरा को तड़ातड़ उसी सिख ने गोली मार दी, जिस पर उनकी सुरक्षा का दारोमदार था। उन्होंने इंदिरा को मार दिया, लेकिन उनकी शहादत को न रोक पाए। इसके बाद तो कांग्रेस में राजीव गांधी ने नेतृत्व संभाला, लेकिन उनकी हत्या के बाद कांग्रेस टूट गई थी। उनकी सत्ता नरसिंहा राव को मिली थी। नरसिम्हा राव ने किसी तरह पांच साल सरकार तो चलाई, लेकिन मिलीजुली। अब क्या था...उनके परिवार से फिर आई सोनिया गांधी। जो एक आदर्श साबित हो गई, जहां इंदिरा में महत्वाकांक्षा दिखी वहीं सोनिया त्याग और आदर्श की मूर्ति कहलाई। अब वो पूरे देश को संभाल रही हैं और विरोधी कितने भी भद्दे बयान दे दें, लेकिन वह तो आदर्श हैं और उनका कद भी आज बहुत बड़ा है।

Wednesday, November 3, 2010

अब यह बिगबॉस है...



हर आदमी में होते हैं दस-बीस आदमी, जिसको भी देखना है बार-बार देखो
...निश्चय ही निदा फाजली की यह पंक्तियां अगर किसी पर सटिक बैठती हैं, तो वह एक ही शख्स है। जिसका अंदाज और अल्हड़ है, वह किसी बात की फिक्र नहीं करता। न तो उसकी लाइफ में एक्शन रीप्ले है और न ही कोई गोलमाल...। पूरी जिंदगी में अभी तक वह अकेला ही चलता आया है। पथरीली डगर से कई बार गाड़ी का बैलेंस भी बिगड़ा है और कई बार वह बेपटरी भी हुई है। अंधेरों में भी जिंदगी आई है और रोशनी खुशियां बनकर भी इसके हंसी में दिखाई दी हैं। न जीवन की फिक्र और न ही अफसोस का कोई मायाजाल है इसकी जिंदगी में। आंखों में मासूमियता, माशाअल्लाह क्या चेहरा, और दबंग बदन...इस पर ही लोग कायल है। खुदा ने बड़ी फुर्सत से बनाया है इस कुंवारे हैंडसम को। कभी कभी तो इसका मन करता था तो सड़कों पर रिक्शा चलाने रात में पहुंच जाता था। पिता की विरासत और सल्तनत इसे ख्वाहिशों के रूप में मिली। बचपन तो चांदी के चम्मच लेकर ही बीता। बड़े हुए तो बीवी हो में अपना गुड लुकिंग फेस सभी के सामने लेकर आ गए। इसके बाद तो इन्होंने कहा मैंने प्यार किया। इनका यह बोलना हुआ कि लोगों ने इन्हें दिलों में बैठा लिया। लड़कियां तो इनकी दीवानी हो गईं। सल्लू मियां यहीं कम न थे, प्यार करने के बाद इनको सनम से बेवफा भी मिली, लेकिन इसमें कौन बेवफा था, ये या वो...यह थोड़ा समझ नहीं आ रहा था। अभी तक कुंवारे ही थे, तो उस अलबेली उमर में प्यार तो लाजमी था, और ये भी इस मोहजाल में फंस गए। कुछ दिन तक इनका रोमांस हुआ, इसमें कभी इन्होंने बाजी मारी तो कभी वह इनका दिल तोड़कर चली गई। फिर ये न हंस पा रहे थे और न ही रो पा रहे थे। इनका अंदाज अपना अपना ही हो गया था। खैर यहां के आगे चले तो इन्हें फिर इश्क हो गया। इन्होंने सनम को दिल दे दिया। सनम ने भी इनका हाथ कसकर पकड़ लिया था। सालों उसने पकड़े रहा। फिर इन्हें इश्क नहीं हुआ। इस दौरान इन्होंने कई फिल्मों में अपना जलवा दिखाया। कभी सनम के ये हुए तो कभी सनम तुम्हारे ही हुए। इन्हें कई बार गर्व हुआ। फिर हर दिल जो प्यार किया और न जाने इन्होंने बॉलीवुड के गुलशन को गुलजार किया। कभी प्लेबॉय बने तो कभी हैंडसम। सांवरिया भी बने ये किसी के और इन्होंने दिल भी तोड़ा। इस स्क्रीन की जिंदगी से अलग इनके जीवन में कई रुकावटें पहाड़ बनकर आईं। हम साथ-साथ रहने का इन्होंने फैसला किया तो इनकी गोली से एक चिंकारा की जान चली गई , जान क्या गई, समझो इनकी शामत ही आ गई। उसी के चक्कर में कई बार इन्हें जेल की हवा भी खानी पड़ी। मगर किसमत अभी और कई खेल दिखाने वाली थी, जो यहां नहीं रुक रही थी। जिंदगी इनकी इतनी बेबस हो गई थी, महबूबा ने भी इन्हें धोखा दे दिया था...ऐसे में जिंदगी से इन्होंने तौबा कर उसकी बेवफाई के आगे हार चुके थे। इन्हें खुद की ही सुध नहीं थी। मोहब्बत का मारा यह दिवाना...ने अपने होठों से नई मुहब्बत का दामन थामा। मगर यह मुहब्बत इस बार इसे कहीं और पहुंचाने वाली थी, शराब से इन्होंने नया इश्क फरमाया और हाल-ए-दर्द निकलकर सामने आ गया। इस शराब ने इन पर ऐसा रौब झाड़ा कि यह सबकुछ भूल ही गए और सड़कों से टकरा कर कई जिंदगियों को घायल कर दिया। अब तो हर कोई इन्हें वांटेड कहने लगा। ये खलनायक बन गए। सनक की बेवफाई से इतने बेबस हो गए कि लग रहा था खुद को संभाल ही नहीं पाएंगे, लेकिन वक्त ने करवट बदली, फिजा ने इनका साथ दिया और दोबारा इन्होंने अपनी गाड़ी को पटरी पर लेकर आ गए। फिर यह तेरे नाम जिंदगी ही कर दी। एक के बाद एक इन्होंने अपनी गलतियां सुधारी। बकायदा सबके सामने इन्होंने कहा कि मैंने प्यार क्यों किया। फिर इसके जीवन में एक और परी आ गई, इसके आने से इस हैंडसम की जिंदगी पूरी तरह से बदल रही थी। इसने बॉलीवुड का दबंग बनने में कोई कसर नहीं छोड़ी। अब यह बॉलीवुड का बिगबॉस है...।

Sunday, October 17, 2010

अधर्मी रावण अभी और भी हैं...


लंबे समय के बाद हमने जीत का उल्लास भी मना लिया और रावण को जला भी दिया। निश्चय ही जब वह जल रहा था, उसमें से विस्फोट हो रहे थे तो हम खुश हो रहे थे, तालियां बजा रहे थे। जैसे ही उसमें से पटाखे की आवाज आती तो हमारा उत्साह चरम पर होता। जब तक वह जमींदोज नहीं हो गया, तब तक हम वहां से हटे नहीं, वहीं डटे रहे, घर से सोचकर ही आए थे कि आज रावण का वध करके ही आएंगे, उसे जलाकर ही आएंगे। यह सिर्फ आपने ही नहीं, बल्कि सैकड़ों भारतवासियों ने किया होगा। सवालों या किसी आडंबर में उलझने की बात नहीं है, क्योंकि यहां तो हमने तमाशबीनों की तरह उसे जलता देख लिया। इसके बाद घर आ गए, मगर क्या यह सोचा आपने कि आपने दिल में बैठी उस बुराई को जलाकर आए। हम बार-बार लगातार हर साल रावण का वध करते हेैं, सिर्फ यह संदेश देने के लिए कि हम लोग सत्य के मार्ग पर चले, बुराई को हरा दें और जीत का सेहरा अपने सिर बांध कर कांटों का मार्ग अपनाएं, फिर इसके लिए चाहे जितनी ही मुश्किलें क्यों न हमारे रास्ते में आ जाएं। अब अधर्म का नाश करना है, मगर संकल्प ले कौन। लोग रावण तो जलाते हैं, लेकिन उसके महत्व और उद्देश्य की पराकाष्ठा को नहीं जान पाते हैं। आखिर क्यों वे यह नहीं समझ पाते हैं कि दुनिया में यदि कुछ सत्य है तो वह है सच्चाई , भलाई। इस मार्ग का पथ बहुत ही कठिन है, बड़ी पतली डगर है, और रपट भी है, बस जीतना है और जीना है, अगर यह नहीं कर पाए तो आपका जीवन ही व्यर्थ है। सच्चाई कभी परास्त नहीं हो सकती है, यह परेशान हो सकती है, इसलिए कभी इसके दामने को कमजोर मत होने दो, जीवन में कई कठिनाइयां आएंगी , कभी तुम समुंदर में गोते भी लगाओगे और कभी तुम्हारा मुकाबला शैतानों से भी होगा , लेकिन पथ-पथ अग्निपथ समझो, और इसमें वीरता की तरह चलो। अर्जुन की तरह सिर्फ श्रेष्ठ धर्नुधरी ही न बनो, बल्कि कर्ण की तरह बुद्धिवाला, दानवीर और परमवीर बनो। वह मरकर भी अमर हो गया। पूरे पांडवों को अकेला ही मार सकता था, लेकिन कभी कृष्ण की बुद्धिपर भी गौर करो, क्योंकि यही वो रास रचैया है, जो महाभारत के युद्ध का परिणाम ही बदलने वाला है। राम की तरह आदर्शवाद लो, लेकिन मर्यादा की झूठी माला न पहनो, सत्य के लिए लड़ो, लेकिन मौके की नजाकत को भी समझो। यह समय कृष्ण की बुद्धि पर चलने वाला है, लेकिन राम की तरह वचन पर अडिग रहोगे तो वीरता तुम्हारी दासी हो जाएगी। दिल को निश्छल रखो, फिर देखो इस दिल से तुम दुनिया जीत लोगे। हर चीज का महत्व है, आज समाज में इतना कूड़ा-कचरा आ गया है कि जिधर देखो मन सड़ने लगता है , लेकिन उत्सुकता की उम्मीदोें को सिर्फ खुशबू की ओर बढ़ने दो, गुलाब की महक बनो, साथ में सच्चाई के कांटे बनकर, क्योंकि यही दुनिया की रीत है, सबसे बड़ी प्रीत है। कितनी भी बेइमानी करो, आगे सब आ ही जाती है। इसलिए अपने हौसलों और हिम्मत पर भरोसा करो, क्योंकि जब दूसरों के कंधों पर बंदूक रखते हैं तो उसकी मजबूती का हमें पता नहीं होता है, ऐसे में कंधे अगर कमजोर निकल गए तो निशाना जरूर चूक जाता है, और जिंदगी में सिर्फ एक शॉट ही रहता है , अगर वह हम चूक गए तो कभी मौका नहीं मिलता। इसलिए हर कार्य को तल्लीनता से करो, दुनिया तुम्हारी मुट्ठी में आ जाएगी। और इसके लिए तुम्हें न सिर्फ मेहनत करनी होगी, बल्कि बुद्धि का भरपूर उपयोग करना होगा । अगर यह करने में तुम कामयाब हो गए तो तुम्हारी आधी से ज्यादा जिंदगी की सफलता तुमने एक शॉट में ही जीत लिया। जिंदगी को क्रिकेट की तरह लो, क्योंकि एक गेंद तुम्हारा विकेट गिरा सकती है। वह एक से छह तक कोई भी हो सकती है। तुम्हें पल-पल हरपल हर गेंद को अपने अनुभव और जोश के तराजु में बैलेेंस कर खेलना होगा। और आपकी एक चूक आपको पवेलियन की राह दिखा सकती है, इसलिए हर समय जागरूक रहो, अलर्ट रहो , जिंदगी कब तुम्हारी दासी बनने आ जाए, उस समय तुम्हें जागना होगा, और उसे अपने पास सदा के लिए रखना होगा, क्योंकि एक बार वह चली गई तो दोबारा नहीं आती है। इसलिए सच्चाई का मार्ग अपनाओ, दिलों से भी रावण जला दो और प्रेम की मुरली बजाते चलो, सारा जग तुम्हारे पीछे-पीछे चला आएगा।

Wednesday, October 6, 2010

‘सोना’ से शान भी और सुकून भी



हर पीली चीज सोना नहीं होती, लेकिन उसका भ्रम जरूर करा देती है। रास्ते में कभी कोई सोने जैसी चीज दिखती है, तो कुछ पलों के लिए वह सोना लगता है, यह अलग बात है कि हमारी नियत कैसी है, जिस पर हमारा अवलोकन होता है...यह तो सब आई गई बात है, मुद्दा तो यह है कि हम पर सोना मेहरबान है, जी हम तो सोने वाले सोने की बात नहीं कर रहे हैं, बल्कि सोने वाले सोने की बात कर रहे हैं...आप भी सोच रहे होंगे कि क्या बकवास कर रहा है, सोना तो एक ही है, जो हमें पीला दिखाई देता है। हम उसे गले में पहनते हैं, और हमारे पलवान खूब सोना कर रहे हैं। मगर हमें तो दूसरा सोना पसंद है, हमें तो सोने में खूब सुकून मिलता है, वह सुकून जो किसी और चीज में आता ही नहीं। हमें भी वह सोना चाहिए और आपको भी वह सोना चाहिए। बाजार सोना उगल रहा है, उसमें उछाल भी खूब आ रही है, लेकिन हमारी जिंदगी की शुरुआत ही सोने से होती है, हमारे जीवन का तो सबसे बहुमूल्य ही है सोना। इसके बिना तो हम चल नहीं सकते। हां भला है, शृंगार है सोना, महिला का सरस और उसका दिल है सोना। उसका अरमान है सोना, जिंदगी से प्यारा है सोना। हर पहलवान जान लड़ा रहा है, लेकिन हमें तो घर में ही मिलता है सोना। खाने के बाद जो सोना मिलता है, उसके तो क्या कहने। ये पहलवान न जाने कितने प्रयास करते हैं, दिन-रात मेहनत करते हैं, मिट्टी झोंकते हैं, शूटर दिनभर रातभर आंखें दुखाते हैं, फिर जाकर कहीं इन्हें नसीब होता है सोना। जो सोना इनके पास है, वह इन्हें नसीब नहीं होता, लेकिन ये दूसरे सोने के पीछे जरूर पड़े रहते हैं। आखिर वह कहावत भी तो सही है हमें दूसरे की थाली का खाना ज्यादा अच्छा लगता है, उसकी थाली में कम खाना हो तब भी हमारी चाहत उसे पाने की होती है। ये लोग भी इससे अलग कैसे हो सकते हैं, हर कोई चाह रहा है कि हां हमें मिले सोना। पूरा देश विदेश...यहां तक की सात-सात फीट वाले गोरे रंग के ये विदेशी भी उसकी चाहत सात समुंदर पार से लेकर आए हैं, इनमें से कुछ को मिला है, कुछ को मिलेगा और कुछ के दिल भी टूट जाएंगे। हमारे यहां भी कुछ ऐसा ही होने वाला है, किसी की झोली में आएगा तो कोई चांदी से ही संतुष्ट रहेगा। मगर चांदी क्या चीज है...क्योंकि सोने की बात ही अलग है। हाय हाय सोना...शादियों से लेकर बारातों तक...त्योहारों से लेकर उत्सवों तक हर जगह तो चाहिए सोना। काश! हमें भी मिल जाए और हमारों वालों को भी मिल जाए...वाह-वाह...सोना सोना...हर कोई इस सोने के पीछे पड़ा है। नई दुल्हनें तो इसका बिना चलती ही नहीं। और हम हैं कि हमारे पास बिना तकलीफ के ही आ जाता है सोना। सोना माथे की शान होता है, लेकिन सोना शहंशाह भी बना देता है और अधिक सोना भोंदू भी बना देता है। तो हम तो आसानी से सोना आसानी से मिल जाता है। हमें भी तो सोना चाहिए...तुम्हें भी तो सोना चाहिए। हां आप भी सही कह रहे हो और हम भी...भई ये सोना ही तो जरूरी है, हम इसके लिए न बिस्तर देखते हैं, न जमीन। बस इसे लूटने में लग जाते हैं। और आप हैं कि इस सोने के लिए आप न जाने कितनों का खून बहा देते हैें। वहां तक तो ठीक है जब आप सोने के लिए मेहनत करते हैं, लेकिन सोने के लिए जब लाल खून बहता है तो फिर सोने का कोई अर्थ नहीं हो जाता है। सोना ...सोना...सोना...कितना चाहिए। चिंता और फिक्र के धुएं को उतारकर रख दो... फिर देखो इतना सोना मिलेगा कि दिल भर जाएगा। फिर बोलोगे कि सोना कितना सोना है..., कितना सोना है... कितना चाहिए और कितना मिलेगा, बस यह तो नियती और चाहत पर निर्भर करता है।

Tuesday, October 5, 2010

साधारण जीत को भी रोमांचक बना दी


अगर दुनिया में एक्साइटमेंट पैदा करना है तो या तो उन्हें हंसा दो , या रुला दो या फिर डरा दो...। अगर यह तीनों नहीं कर पाए तो असाधारण भी साधारण बनने में देर नहीं लगती है। दुनिया में बड़े लोगों को जाना क्यों जाता है, क्योंकि उन्होंने साधारण कार्य को भी असाधारण तरीके से अंजाम दिया है। उन्होंने गरीबी होने के बावजूद उसका प्रकट करने का पाप नहीं किया है, क्योंकि वह उससे भी शर्मनाक होता है। जिंदगी को जुए की तरह माना है, इसमें हर बाजी को जीतने के लिए बाजीगर बनना पड़ता है, अगर वह जिंदादिली नहीं दिखाई तो फिर इस भंवर में आप कहां समा जाते हो कोई नहीं जानता। खाते तो सभी हैं, लेकिन खाने का तरीका यूनिक जिसका होता है, उसे ही जाना जाता है। सोते तो सभी हैं, लेकिन जिन्हें जागने का शौक होता है, वे ही पहचाने जाते हैं, जागते तो मूर्ख हैं, लेकिन उनका जीवन तो व्यर्थ ही हो जाता है। जिंदगी की वैतरणी को अगर पार लगाना है, तो आपको आगे आना होगा । आपको दूसरों से बेहतर करना होगा। बाजार में मारा-मारी मची हुई है, हर कोई मैदान मारने के लिए तैयार है, नजर हटी और आपको कहां फेंक दिया जाएगा कोई नहीं जानता है। आज भी वही हुआ, हुआ यह कि हम जीत गए...हालांकि इस जीत को हम बहुत हल्के से भी कर सकते थे, लेकिन जहां इंडिया और उसका क्रिकेट है, फिर तो भावनाओं का सैलाब पटरी पर एक्सप्रेस बनकर दौड़ता है। जुनून जिंदगी से बढ़कर हो जाता है। और यहां वही हुआ। टीम आसानी से जीत सकती थी, लेकिन उस आसान जीत को हमने बना दिया टिपिकल...और ऐसा हुआ भी...। कंगारू बौखला गए और उन्होंने टीम इंडिया का जीना मुहाल कर दिया। एक-एक गेंद पर आग बरस रही थी, मैदान पर शेर दिखने वाले हमारे दिग्गज कागजों से मुरझाए नजर आ रहे थे। टीम इंडिया के सबसे कातिल बल्लेबाज जो गेंदों को मौत के घाट उतारते हैं, वो तो बिलकुल लापरवाह दिखे, लापरवाही की हद उस समय हो गई, जब टीम इंडिया संकट में नजर आ रही थी। एक के बाद एक विकेट गिरता जा रहा था, लेकिन बिगड़े नवाब थे कि सुधरने का नाम ही नहीं ले रहे थे। उन्होंने अपने उसी लापरवाह वाले अंदाज में शॉट खेला और कंगारूओं द्वारा जप लिए गए। इसके बाद तो न रैना ने रनों की बरसात चली और न ही टीम इंडिया का गौरव बढ़ा। हर कोईअपने ही अंदाज में जी रहा था, चल रहा था, लेकिन परिस्थितियां विपरीत थीं और वह सचिन से काफी उम्मीदें भी थीं, मगर उम्मीद का दामन टूटा नहीं, सचिन से आस थी, पर क्रिकेट का यह पितामह हर बार तो विरोधियों पर भारी नहीं पड़ सकता था, इस बार कंगारूओं की चली और उन्होंने सचिन को अपना बना लिया। सचिन के आउट होने के बाद लगा कि टीम इंडिया फिर बिखर गई और हार हमारी पक्की है, लेकिन एक ऐसा गेंदबाज, जिसके सितारे एकाएक बुलंदी पर आ गए थे, वह इशांत शर्मा ...गेंदबाजी में अपना जौहर दिखाकर कंगारूओं की कमर तोड़ने के बाद अब वह बल्लेबाजी में भी अपना हुनर दिखाने को बेताब थे, और उनका यह हुनर ऐसे मौके पर आया, जब टीम को जरूरत थी कि कोई खड़ा होकर टीम की न सिर्फ लाज बचा पाए, बल्कि उसे जीत के मुंहाने तक भी पहुंचा दे। आखिर हुआ भी वही और उसने अपने बल्ले के दम पर खूब छकाया, उसने खूब परीक्षा ली और एक समय तो कंगारूओं को हताश ही कर दिया था। हार का गम पंगेबाज पॉटिंग के चेहरे पर साफ नजर आ रहा था, लेकिन एक गलत निर्णय के वे फिर शिकार हो गए, लेकिन लक्ष्मण थे मैदान पर और उन्होंने तो सीखा ही नहीं था कि युद्ध को बीच में ही छोड़कर जाया जाए। अंतिम दम तक वो लड़ते रहे और अपनी टीम को जीत दिलाकर ही लौटे। जीत भी ऐसी थी , रोमांच से भरी हुई। कब क्या हो जाता हर गेंद पर दर्शकों के लिए मनोरंजन चल रहा था।

Thursday, September 30, 2010

अयोध्या का धर्मसंकट


बागों में बयारों में सन्नाटा छाया है
दहशत और डर का साया है
क्यों अमन में आंच आ रही है
...धर्म के नाम पर आवाज आ रही है
तनाव का तूफान फैल गया है...बस गुजारिश है
इसे यूं ही थमने दिया जाए...
अयोध्या पर फैसला किसी धर्मसंकट से कम नहीं है। आखिर अयोध्या के अध्याय का बवंडर पूरे देश में फैल रहा है, कब क्या हो जाए, कहां से कोई चिंगारी उठकर शोला बन जाए कुछ कहा नहीं जा सकता है। दिलों में आग दहक रही है और एक गलती उसे ज्वालामुखी बना देगी। ऐसे में कुछ दिलों में अमन के लिए भी जज्बात उमड़ रहे हैं, आखिर फैसले की इस घड़ी में हर कोई दोहरी जिंदगी में फंस गया है। क्यों यह मुश्किल हो रही है, क्यों आईने में तस्वीरों पर खून नजर आ रहा है, क्यों समुंदर की लहरे आज टकराकर बाहर आने को बेताब हैं, क्यों इस फिजा में गरमी बढ़ गई है, क्यों मुहब्बतों का बाग की खुशबू खत्म होती नजर आ रही है। अयोध्या ने तो अपने नाम के अनुरूप ही हमेशा फैसला किया है, यहां कोई युद्ध नहीं, लेकिन देश क्यों बेताब हुआ जा रहा है, पार्टियां क्यों सियासत के लिए सितम ढा रही हैं, आज तो क्वार की यह धूप भी दहक रही है, मगर पहरा भी तो है। यह सूरज की रोशनी पूरे समय पहरा दे रही है, कहीं आशंकाओं के बादल इस भय को बढ़ा न दें, कहीं कोई तनाव का तूफान आकर देश को उजाड़ न दे। हर किसी की आंखें और कान अयोध्या पर लगे हैं। मजार और मूर्ति का यह लफड़ा पचड़ा बन चुका है, जिससे पूरा देश बदनाम हो गया है। सालों की शांति में आज खौफ नजर आ रहा है। दिलों में रहने वाली मुहब्बत में आज जहर दिखाई दे रहा है। जो गुलशन दोनों धर्मांे की इबादत से गुलजार होता था, आज वह मजधार में फंसा हुआ है । आपस में प्रेम करना सीखो मेरे देश प्रेमियों, मगर यहां तो कुछ और ही हो रहा है, मंदिर और मस्जिद की लड़ाई घर-घर में पहुंच गई । रगों में खून की जगह धर्म बहता दिखाई दे रहा है और यह देश के लिए काफी घातक हो सकता है, क्योंकि यह भावनाओं का उबाल है , और जब यह आता है , तो सिवाय तबाही के और कुछ भी नहीं होता है। देश उस अंधी आग में सो रहा है और यह जागेगा तो न जाने क्या होगा। पूरा विश्व आज हमारे यहां मेहमान बना है, और ऐसे में हमारी हर हरकत पर उनकी नजर है । नजरे तो उन दुश्मनों की भी हैं, जो सालों से ऐसे मौकों के इंतजार में जुटे हुए हैं। मस्जिद और मंदिर के खेल को वो दिलों तक पहुंचाकर उसमें ज्वार लाना चाह रहे हैं। ऐसे में हमें ही उस फिजा को स्वच्छ रखना होगा, जो बदलती नजर आ रही है। इस धर्मसंकट के लिए न तो कोई राम आएंगे और न ही कोई अल्लाह। कुछ खून खराबा हुआ तो वह भी हमारे अपनों का ही होगा। दर्द भी हमें होगा और खून भी हमारा ही बहेगा। इसलिए संयम और सन्मति के इस मौके पर देश हित का फैसला लें, पूरी तरह से शांति और संयम धारण कर इस डर पर जीत दर्ज करें। शांति और एकता के इस पथ पर चलने वाले हमारे देश को कोई भी फैसला डिगा नहीं सकता, सालों से जो हमारे हैं, उनसे हम लड़ नहीं सकते, देश को आज अमन की आस है, और उस पर हमें आंच नहीं आने देना है।

Thursday, September 2, 2010

हे पार्थ यह तो कर्मयुद्ध है...



इतिहास गवाह है कि अगर महाभारत के युद्ध में कृष्ण पांडवों का साथ न देते तो अकेला कर्ण ही पूरी सेना पर भारी पड़ता, लेकिन मैनेजमेंट के इस गुरु ने ऐसा युद्ध मैदान में बिना शस्त्र उठाए ऐसा खेल दिखाया कि कौरवों की अपार सेना के साथ महावीर और विश्वविजयी कर्ण भी हार गए। पांचों भाइयों के साथ खड़ा ये ग्वाला अपनी वैराग्यता और चातुर्यता से पूरे युद्ध की वल्गाएं खींच रहा था, यह शस्त्र तो उठा नहीं रहा था, लेकिन सारथी बना बैठा पार्थ के रथ की वल्गाएं नहीं थामे था, बल्कि पूरे युद्ध की वल्गाएं इसके हाथ में थी। यह जिस तरह चाह रहा था, वैसा ही तो उस युद्ध भूमि में हो रहा था। इसने हर मान को और हर वचन को निभाया, लेकिन कर्ण के सामने यह छोटा पड़ गया। जिस समय अर्जुन और कर्ण का युद्ध चल रहा था, उस समय कृष्ण ने कहा कि जीत के लिए सारे साम, दाम, दंड भेद और कूटनीति सबका इस्तेमाल कर दो , क्योंकि हार के बाद तुम्हें कोई नहीं पूछेगा। तुम इस धरती में मिट जाओगे। ठीक वहीं हुआ कर्ण के साथ, सत्य का वह पुजारी, कान्हा की आंखों और चातुर्यता की भेंट चढ़ गया, लेकिन वचन का तो वह भी पक्का था, तभी तो कान्हा ने भी उसकी देह को ऐसी जगह ले गए, जिस पर किसी और का वश नहीं चलता। उदंडता तो उस समय हो गई थी जब कान्हा ने अपने वचन से भी दगा कर दिया था, उन्होंने जो वचन दुर्योधन को दिया था, वह कर्ण के आगे टू ट गया, लेकिन कर्ण ने जो अपनी मां को वचन दिया था, उसने उसका पूरा मान रखा। वह चाहता तो उन चारों भाइयों को कब का मौत की नींद सुला सकता था, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। उसे तो केवल अर्जुन को मारना था, लेकिन अर्जुन के साथ तो चालबाज कन्हैया था, जिसने पूरे समय कर्ण से उसे दूर ही रखा। पहले उसका कवच-कुंडल हथियाया, फिर श्राप का कोप और बाद में धोखा...इसके बावजूद भी वह वीर कर्ण शूरवीर की तरह लड़ा। इस दौरान का वह प्रसंग भी तो हैरत करने वाला ही था, जब कर्ण बाण मारता तो अर्जुन का रथ 5 फीट पीछे जाता, और जब अर्जुन बाण मारता तो कर्ण का रथ 10 फीट पीछे चला जाता। इस पर कर्ण के बाण पर मुरली वाले कहते वाह कर्ण वाह...यह देखकर अर्जुन हैरत में पड़ जाता है और वह कहता है कि हे कान्हा आखिर मेरे बाण का असर तो ज्यादा दिखाई दे रहा है फिर कर्ण के बाण पर आप उसे वाह-वाह क्यों दे रहे हैं, तो कान्हा कहते हैं अर्जुन तेरे रथ पर तो मैं और हनुमान बैठे हैं, तब भी पांच फीट जा रहा है, उसके रथ पर तो कोई नहीं है। आखिरी में उसका रथ कीचड़ में फंस जाता है, उस समय कर्ण ने कहा था कि मैं निहत्था हूं और वीर निहत्थों पर वार नहीं करते, लेकिन कृष्ण ने उस समय अर्जुन को कहा कि इसे मत छोड़ो और वहीं पर उसका वध कर दिया गया। वह मर कर भी युद्धभूमि को अमर कर गया। ऐसा महान था कर्ण, जिसने कृष्ण के कद को छोटा बना दिया था। बात यहां कृष्ण को कम करने की नहीं है,बल्कि यह भी है कि युद्धभूमि में कोई किसी का रिश्तेदार नहीं होता है और यह जीवन एक कर्मयुद्ध है, अगर यहां सभी योद्धा हैं और जिस तरह एक म्यान में दो तलवारें नहीं रह सकती हैं, उसी प्रकार एक युद्ध में दो विरोधी वीर नहीं हो सकते , या तो उसे मरना होगा या इसे। भावनाओं के खेल वास्तविकता के धरातल पर चकनाचूर हो जाते हैं और सपने हकीकत तभी बनते हैं, जब उसके लिए दृढ़ इच्छा शक्ति और असीम त्याग करना पड़ता। अर्जुन कई बार दुर्बल हुआ, लेकिन उसके साथ वह कृष्ण था। आज भी हमारे पास कृष्ण के आदर्श हैं और उस तरह से जीवन को जीना चाहिए, क्योंकि मैनेजमेंट का जमाना है और अगर जीवन मैनेजमेंट आपने नहीं किया तो कुछ नहीं हो सकता है।

Thursday, August 26, 2010

‘वो’ ‘उनसे’ बढ़कर हो गया


मुहब्बत की हवा कब बदल जाए यह कोई नहीं जानता है। यह कब किसके लिए उमड़ जाए यह जान पाना भगवान के लिए भी मुश्किल है। प्यार के ढाई अक्षरों में भले ही ऊपरी रंगत न हो, लेकिन तह में उतरने पर यह जिंदगी का या तो सबसे बड़ा दु:ख बन जाता है या फिर सुख। कई जानें भी बर्बाद हो गई, कई गुलशन भी गुलजार हो गए। किसी को मौत मिल गई तो कोई जिंदगी को जन्नत बनाए बैठा है। आशिकी, दीवानगी औैर दिल्लगी की यह धारा कब अपना मार्ग बदल दे कुछ कहा नहीं जा सकता, यह कभी-कभी उधर भी मुड़ जाती है, जिधर जाने का कोई सवाल ही नहीं रहता है। यह नदी नहीं है, बल्कि बिफरा समुंदर है, जो रास्ते तोड़ता हुआ अपनी मंजिल पाता है, इसके बीच में आने वालों की न तो यह पर्वाह करता है और न ही उन्हें छोड़ता है। मगर प्यार के बाद प्यार की दास्तांनें भी देखी गई हैं, और ये उतनी ही सच हैं, जितना की आप और मैं। बात उठी है इश्क की तो इसकी गर्माहट के साथ इसके बहके कदमों पर भी गौर फरमा ही लिया जाए, यह मीठा जहर तो है ही, साथ ही अंधा भी होता है, क्योंकि यह जब होता है तो यह भी नहीं देखता कि वहां सिर्फ मौत है, बर्बादी है और तबाही। आंसू तो इनका हफसफर बन जाता है और हौसला इनका साथी। ये दोनों मिलकर मुहब्बत की नई इबारत को जन्म देते हैं। बात उस मुहब्बत की नहीं है जो एक से हो, बात है उस मुहब्बत की, जहां से इसकी कोई गुंजाइश नहीं होती है। बात उस मुहब्बत की है, जहां से इस तरह के सारे दरवाजे बंद हो जाते हैं। दूसरों के बारे में सोचना भी नहीं चाहता है। आपको रब ने बना दी जोड़ी याद होगी, जिसमें नायिका को अपना पति पसंद नहीं था, भले ही वह उसके लिए न जाने क्या -क्या करता था, मगर वह उससे प्यार नहीं करती थी, जबकि वही पति दूसरे रूप में जब उसका मन बहलाता है तो वह उसे प्यार करने लगती है। बात यहीं से है, कि सारा खेल जरूरतें पूरी करने से नहीं शुरू होता है, बल्कि दिलों को जीत ले वहीं माशूका और आशिक का दिलजीत होता है। यहां से मैं आपको एक ऐसी कहानी, लेकिन सच्चाई की तह में ले जाऊंगा, जहां से आपको यकीन हो जाएगा कि यह दिल भी कितना बावला होता है, कब किसको बिठा ले और किसको बाहर कर दे कुछ कहा नहीं जा सकता।
बात पांच साल पहले की है, मिस्टर और मिसेस जोशी। अपनी शादी के 15 साल गुजार चुके थे, इस दौरान उनमें इतना प्रेम था कि पड़ोसी और रिश्तेदार उनकी मिसाल दिया करते थे। उन्हें दो बेटे और एक बेटी भी थी, जो पढ़ाई करते थे। मिसेस जोशी माशाअल्लाह क्या खूबसूरत थीं, वहीं मिस्टर जोशी भी कम नहीं थे। दोनों का प्यार अब तक जवां था। हर दिन वो एक दूसरे को अपना प्यार की कसक और उसका एहसास दिला ही देते थे, साथ ही उस ईश्वर का भी शुक्रिया करते थे, जिन्होंने दोनों को मिलाया था। उनकी जिंदगी की गाड़ी समतल सड़क पर बिना उतार-चढ़ाव सरपट दौड़ रही थी। एक दिन जोशी जी को एक माह के लिए आॅफिस के काम के सिलसिले में बाहर जाना पड़ा। इस दौरान ही उनके घर के बाजू वाले फ्लैट में अमित नाम का एक युवा रहने आया था। वह अकेला था इसलिए उसने मिसेस जोशी से कुछ हेल्प मांगी। इस दौरान दो-तीन दिनों में वो काफी घुल मिल गए, और लगभग पंद्रह दिन हुए थे कि अमित ने उससे इजहारे इश्क कर दिया। वो क्या सुरुर था, वो क्या अहसास था, या कहे कि वो क्या समय की खुमारी, या इश्क का अहसास था जिसने मिसेस जोशी की हां में उस इश्क का जवाब दिया। वो मिस्टर जोशी के लिए जो अपनी जान भी दे सकती थीं , वह सब भूलकर वह भी अमित से प्यार करने लगी। अब तो महीना गुलजार गुजरने लगा। धीरे-धीरे उनकी नजदीकियां भी बढ़ने लगी। प्यार प्रगाढ़ होने लगा। कब महीना बीत गया कुछ पता ही नहीं चला। और जोशी जी भी काम करके आ गए। अब उन दोनों के बीच की वो प्यारी कशिश कम होने लगी। हालांकि मिसेस जोशी उन्हें अहसास नहीं होने दे रही थीं, लेकिन दिल तो वो विद्वान है जो हर चेहरे को किताब की तरह पढ़ लेता है। कई बार जोशी जी ने उन्हें कहा भी कि तुम्हारा प्यार कम हो रहा है , तो मिसेस जोशी उन्हें टाल गईं। जब वो आॅफिस चले जाते तो वो घंटों अमित के साथ अपने इश्क की इबारत को लिखने में जुटी रहती। अब मिसेस शर्मा के लिए ‘वो’ ‘उनसे’ प्यारा हो गया था। प्यार बदल गया था, जिंदगी का वो पंद्रह साल पुराना अहसास इस नए प्यार के आगे बंट गया था। तो लगा कि दिल तो बच्चा होता है, यह नादान होता है, कब इसका मन किसे चाहने लगे कोई नहीं जानता है। यह जिंदगी है...जिसमें न जाने कब समतल सड़क पर एक बड़ा गड्ढा आ जाए और जिंदगी का बैलेंस डगमगा कर किसी और टैÑक पर चला जाए। ही तो जिंदगी है जो किस पटरी पर कब दौड़े किस राह में कब बंट जाए, किसकी हो जाए और किससे रिश्ता तोड़ ले....सब अनजाना है...।

Wednesday, August 25, 2010

अकेले शिकार तो शेर ही करते हैं


यहां किसी को ललकार कर युद्ध में शेर बनाने की बात नहीं चल रही है, क्योंकि एक दिन के शेर मेमने ही होते हैं, जो मैदान-ए-युद्ध देखकर पीछे की ओर भागते हैं, क्योंकि उन्हें मौत का भय रहता है। साहस एक दिन में पैदा नहीं होता और जिनका खून खून होता है, वो पानी कभी नहीं बनता। सूअर ही ग्रुप में शिकार करते हैं, शेर अकेला करता है। बस यही तो जीवन का दर्शन है, जहां जीना एक दुर्लभ है। क्या जीवन जीते हो, और क्या नहीं? सवालों के बादल घुमड़-घुमड़ के घूमते रहते हैं , कभी जिंदगी में यह गरजते हैं तो कभी बादल बूंदों के बाण बनाकर छलनी भी करते हैं, मगर तय यह करता है आप उसके सामने कैसे खड़े हो। जिंदगी सबको दी है, जाहिर है आप अपंग नहीं है, क्योंकि तब आपके पास बहाना होता। अब कोई बहाना नहीं चलने वाला। मगर फिर भी हम यह उलाहाने देकर सच्चाई की आंखों में धूल झोंककर साफ निकलना चाहते हैं। समुंदर की लहरे उन्हें ही सलाम करती हैं, जो उनके विरुद्ध चलते हैं, उन्हें नहीं जिसे वो ही फेंकती हैं। और जिसे वो फेंकती हैं, वह मुर्दा ही तो है। इस जीवन कश्ती में कुश्ती करनी पड़ती है और अगर एक भी दांव गलत चल गया तो जीवन की जंग हार जाते हैं। जीवन एक शतरंज है और इसे जीतने के लिए बुद्धि की जरूरत है, अगर तुममें दम नहीं है तो तुम्हें यहां से उखाड़कर फेंक दिया जाएगा। उन विरोधी और घमंडी अश्वों को काबू में करना है तो उस पर कोई बल का प्रयोग नहीं होगा, क्योंकि वहां तो वल्गाएं खींचने में जो माहिर है, बस वही उनका मालिक कहलाएगा। इतिहास के पन्नों का उधेड़े तो सबकुछ सामने आ जाएगा। फिर चाहे रामचंद्र की रावण विजय हो या फिर कर्ण का विश्वजीत बनना। मगर बुद्धि के साथ जीवन की वैतरणी में पार लगाना हो तो कृष्ण की तरह बनो, जो अर्जुन के सारथी बनकर गीता के सागर से उसे सुरक्षित लेकर आ गए। यह सिर्फ कृष्ण ही तो कर सकते थे। चालों की चपलता से इतिहास बदल जाते हैं और शहंशाहों के ताज मिट जाते हैं, सल्तनतें खाक में मिल जाती हैं तो फिर क्यों यह गर्व है, जिसमें झूठे आडंबर है, खोखला अहंकार है। अहंकार तो उस वैश्या में भी है जो जमीन की धूल है, लेकिन उस धूल को चांटने भी तो ताज पहनने वाले ही जाते हैं। मिथ्याओं का महल खड़ाकर उसमें ज्यादा दिनों तक रहा नहीं जा सकता, क्योंकि पहली आंधी तो वह बर्दाश्त कर भी जाएगा, लेकिन दूसरी आंधी तो उसे ढहाकर जाएगी ही। अब यहां से उम्मीदों की उड़ान को परवान चढ़ाना गलत है, यहां तो हवाएं भी कातिल हैं और लोग उस कत्ल के बाद लाशों से भी उगाही में जुट जाते हैं। जीवन से बेवफाई कर किसी के तलवे चांटकर अगर जीवन जीते भी हो तो निश्चय ही वह मृत है। माना की यह कलियुग है, लेकिन कोई भी युग हो खून और सिद्धांत तो नहीं बदलते। गैरत और रौब तो कम नहीं होता। यहां किसी को उद्वेलित करने का मन भी नहीं है, लेकिन जमीन पर रेंगने से अच्छा है कि जमीन से ऊपर उठो। यहां बहुत सारे केकड़े हैं जो तुम्हारी टांगे खींचेंगे, लेकिन उन्हें हराने की कोशिश तो करो। जीवन किसी के रहमोकरम पर पल रहा है तो क्या मतलब, कभी अपनी शक्ति और अस्तित्व को भी तो पहचानकर देखो। एक बार जीना तो सीखो...। जिस मां ने तुम्हें जन्म दिया है उसने तो कभी नहीं चाहा कि उसका लाल किसी के तलवे चांटे, सम्मान की बात एक तरफ, लेकिन पराधीनता वह भी मन से...शायद अंग्रेजों की पराधीनता तो फिर भी ठीक थी, लेकिन अब तो पराधीनता का स्वरूप ही बदल गया है। अब तो चमचो ने चांद को छूना सीख लिया है, लेकिन यह चांद खोखला है, क्योंकि वह किसी और का तलवा था, जिसे छूकर तुम यहां तक पहुंचे हो...। मत जियो यार ऐसी जिंदगी, अपने भीतर झांको, इस ईश्वर ने तुम्हें भी वो आवाज दी है, जिससे यलगार पैदा हो जाएगी। एक बार दहाड़कर तो देखो, दुनिया के कदम पीछे अपने आप चले जाएंगे।

Tuesday, August 24, 2010

तुझे सब है पता है न मां...



भगवान हमारे साथ हर समय हमारे साथ नहीं रह सकते हैं, शायद इसलिए उसने हमें मां दी है...हर गम और हर तूफान से हमें बचाती है मां। जब कोई मुश्किल आए तो दुनिया में मां ही होती है, जो अपने बच्चे के साथ डटकर खड़ी रहती है। जब भी मैं उदास हुआ, वह मुझे दुलराने लगी। जब भी कुछ जरूरत हुई तो उसने अपना पेट काटकर मेरी उस जरूरत को पूरा किया। हर गम को सहा उसने, मगर मुझे हर आंच से बचाया। कभी भूख लगी तो मनपसंद खाना तैयार कर देती थी। मगर आज मैं इतनी दूर हूं, मां से काफी दूर आ गया हूं। वक्त और हालातों के थपेड़ोें में वह बचपन की यादों तोहफा ही मेरे पास है, जो सिर्फ आंसू ही देता है। वो पल, जब मैं बीमार हो जाता था तो मां रात-रात भर मेरे सिर पर हाथ धरे बैठी रहती थी, जब कभी मुझे लग जाती थी तो उसका दर्द मैं मां की आंखों मेें महसूस किया करता था। मैं बहुत छोटा था और तोतलाकर बोलता था, मेरी उस भाषा को और कोई समझ नहीं पाता है, सिवाय मेरी मां के। मैं जो भी बोलता, न जाने वह कैसे समझ जाती। क्योंकि वो मेरी मां है, उसे न जाने क्यों मेरी तकलीफ मुझसे पहले पता चल जाती है। अब मैं उससे सैकड़ों मील दूर हूं, और वह पल मुझे बार-बार रुला रहे हैं। मां अब मुझे भूख लगती है तो यहां सिर्फ चावल ही मिलते हैं, तुम्हारी बहुत याद आती है, तुम्हारे हाथों के खाने की। मुझे लगता है कि मैं भी कितना शहंशाह था घर में, हर समय मां को सताया करता था, हर बात पर रौब और हुक्म झाड़ता था। यहां तो मेरा कोई रौब नहीं चलता मां। मां तेरे बिना यह दुनिया कितनी अधूरी है, कितने बेदर्द हैं लोग , जो हमेशा नोंचने के लिए बैठे रहते हैं। अब रात को जब मैं बिस्तर पर सोता हूं तो तेरी गोद नहीं मिलती, तेरा वो मेरे सिर पर हाथ फेरना...मां तुझे सब है पता...मैं यहां बहुत दूर हूं तुझसे, मगर मुझे मालूम है कि मेरी तकलीफ का अहसास होगा तुझे, मगर मां मैं क्या करू, मुझे भी तेरी बहुत याद आती है, यहां खाने में रोटी नहीं मिलती है, चावल देखकर रोना आता है मां...पैसे और कॅरियर ने मां मुझे तुझसे दूर कर दिया है , मुझे पता है कि तू भी उदास है और मुझे पता है जब मैं जा रहा था तो तेरी आंखों से आंसू बह रहे थे, और मुझे यह भी पता है कि जब मैं तुझसे फोन करता हूं तो बाद में तू घंटों रोया करती है, मेरी यह बातें तेरे मन को तड़पा देती हैं, मगर मां यह दुनिया कैसी है, अब मैं साफ बोलता हूं, फिर भी समझ नहीं पाती। मां मैं तुझे रोज याद करता हूं मां। तेरी नजर मुझे पता है कि दरवाजे पर ही टिकी रहती है कि कब तेरा लाल आएगा, मां मैं जानता हूं, और मेरा भी मन यहां नहीं लगता है। मैं जल्द आऊंगा!

Sunday, August 22, 2010

दौलत की अंधी जंग


पैसा भगवान नहीं है, लेकिन भगवान से कम भी नहीं...सचमुच पैसे का चाबुक आपके पास नहीं है तो इस दुनिया में जिंदगी को हकालना बहुत मुश्किल हो जाता है। इसलिए इसका साथ होना बहुत जरूरी है। आज कोई भी ऐसा शख्स नहीं है, जिसका दुनिया में दौलत के लिए मोह न हो। बड़े-बड़े तख्त और ताज भी इसमें लुट गए, हत्याएं और डकैतियां सिर्फ इस दौलत के लिए ही हुई हैं। मगर इसकी भी खासियत है कि यह हमेशा बेवफा रही है। इसमें एक सुहागन का कोई गुण नहीं है। क्योंकि यह एक की हो ही नहीं सकती। इसकी तो दुनिया चाहने वाली है तो यह भी क्या करे, आज इसके पास तो कल उसके पास। आज उससे वफा और कल उससे बेवफाई। लगातार बार-बार यह क्रम चलता ही जा रहा है, हर कोई इस अंधी जंग में उतरना चाहता है, दौड़ना चाहता है। मगर बेबसी है कि वहां तो पांव रखने की जगह भी नहीं है तो दौड़ने की कहां से मिलेगी, लेकिन यहीं तो सारा पौरुष दिखाना है, अगर यहां कामयाब हो गए तो जिंदगी की रावलपिंडी पटरी पर सरपट दौड़ने लगेगी। यह तो हो गई दौलत की दास्तां...मगर पिक्चर अभी बाकी है मेरे दोस्त। कहते हैं जब किसी चीज को शिद्दत से चाहो तो सारी कायनात उसे मिलाने के लिए जुट जाती है, भई हम जैसे लोगों ने दौलत को हमेशा से ही चाहा है, लेकिन यह कायनात उसे छीनने पर तुली रहती है। आज का कोई ब्रहस्त्र है तो वह सिर्फ माया ही है। अगर माया का खेल नहीं आया तो समझ लो तुम्हारा जीवन में आना व्यर्थ ही कहलाएगा। जीवन की कश्ती का वैतरणी के पार होना मुश्किल हो जाएगा। सड़क में इतनी खाइयां आ जाएंगी कि गुजरना असंभव हो जाएगा। यहां अगर कुछ करना है तो वह है दौलत से दोस्ती करो और उसे सदा के लिए अपने पास ही रख लो, फिर तो तुम्हारा जीवन ही सफल हो जाएगा। बहुत से पीर फकीर और बाबाओं ने कहा है कि इस मायामोह में कुछ नहीं रखा है, जो भी है भगवान के चरणों में उसकी भक्ति में। तब सत्य क्या है, क्या सत्य है इस दुनिया में । सचमुच इस पर भी विश्वास करना एक कठिन कार्य तो नहीं है। कहीं राम भगवान थे, कोई रावण असुर था, क्या ग्रंथों में लिखा सच्चाई थी , कृष्ण हैं...किसी से भी आप इस समय पूछेंगे तो वह तपाक से उत्तर दे देगा, बिलकुल थे। शायद आप भी और मैं भी हां कह देंगे, लेकिन इसके पीछे भी कहीं कोई रचियता तो नहीं है। क्या आपने राम के युग को देखा है, या किसने देखा है, जिससे हम मिले हों। जाहिर है समाज रुढ़ियों में कैद है और इस बात से आप भी इनकार नहीं कर सकते। वह तो बीमारियों के लिए भूत-पिशाच को दोषी देता है, जिसे हमने मानना बंद कर दिया है , तो क्या यह नहीं हो सकता है कि उस समय कोई इतना महान लेखक हो, जिसने राम के युग की एक कल्पना की हो और उसकी कल्पना इतनी प्रबल और सत्य के समान है कि उसे झुठलाने की कोशिश नहीं कि जा सकती है। यहां अभी आप थोड़ा कन्फ्यूज हो गए हैं, बात यह है कि हो सकता है आज हम किसी फिल्म को लें लें, कृष को ही ले लिया जाए। मानों पूरे रिकॉर्ड और दुनिया तबाह हो जाए। इस धरती पर कुछ नहीं बचे।
अरबों साल बाद कोई नया जीवन आए, उस समय कहीं पृथ्वी में दबी हुई कृष की सीडी मिल जाए या फिर किताब मिल जाए। तो उस समय के लोगों को तो कृष भगवान ही लगेगा। उन्हें तो यह नहीं लगेगा कि यह किसी राकेश रोशन और रितिक रोशन जैसी कोई कल्पना होगी। अब इससे तो आप मेरी बात से पूरी तरह से सहमत हो चुके होंगे। ऐसा ही राम और कृष्ण के संबंध में भी हो सकता है। हमने उन्हें ग्रंथों में ही तो पढ़ा है, जो आज तक हमारी श्रद्धा को बनाए हुए हैं। बात यही बताने की है कि क्या श्रद्धा कुछ है , भक्ति कुछ है, या फिर दौलत ही खुदा है। यह सोचने का विषय है?

Saturday, August 21, 2010

अमीरी के आगे गिड़गिड़ाती गरीबी


मेरी किस्मत में मेरी तकदीर लिखी है, लेकिन मेरा ही बस इस पर नहीं चलता...सचमुच यह जीवन की सबसे बड़ी सच्चाई है।
सदियों से गरीबी ने आदमी को जीने नहीं दिया है। वह युग हो या फिर यह युग। या फिर आने वाला युग । हर युग में यही दिखाई दे रहा है कि गरीब गरीबी के आगे गिड़गिड़ाता रहेगा, लेकिन वह इसकी एक न सुनेगी। हर अमीर आज चांद को छूने की बात करता है, लेकिन गरीब के पास जमीन पर रहने तक का बसेरा नहीं है। कुदरत भी न जाने क्या कहर बरसाता है, जिसमें न आदमी सिसक पाता है और न ही तड़प पाता है। दुनिया में न जाने कितने रंग हैं, जिसने जीवन को जहन्नुम बना दिया है। आखिर कब तक हम आश्रय की जिंदगी के मोहताज रहेंगे। कब तक यह खुरदुरी जमीन पर हमें रीते पांव दौड़ लगानी होगी। अब तो मुश्किल हो रहा है, क्योंकि पांव लहूलुहान हो गए हैं। क्या करें, कुछ समझ नहीं आता है, जिंदगी जीने के ख्वाब देखती है, लेकिन गरीबी है कि उस ख्वाब का कत्ल कर देती है। बचपन से इसने बहुत रुलाया, पहले मां बाप को, उनसे पहले दादा दादी को, इसके बाद अब मुझे रुला रही है। मैं जब से भी थोड़ा समझदार हुआ हूं, इस सेठ के आगे देखा है कि घुटने टेके और हाथ फैलाए ही खड़ा हुआ है। ऊपर से यह बेदर्द समाज, जो आदमी को नीचे ही रखना चाहता है, उसका भी तो कुछ किया नहीं जा सकता है। स्थिति गंभीर और विकट है, कौन बचाएगा इस रोग से, जो शरीर को अंदर ही अंदर तोड़ देता है। न तो जीने देता है और न ही मरने देता है। दो धारी जीवन हो जाता है, जिसके अंदर से बूंद-बूंद खून गिरता है। वह सिसकन बड़ी तड़पाती है, क्योंकि यह गरीबी भूख से मार देती है, कभी रोग से मार देती है, इनसे भी बच गए तो अमीरों के तलवों के नीचे मार डालती है। आखिर कैसे जिए, इस गरीबी में, क्योंकि इसकी सबसे बड़ी सहायक इसकी बहन महंगाई डायन है। उसका तो प्रलय सब दूर चल रहा है, उसने तो अमीरों को भी नहीं बख्शा है, लेकिन उनके पास लक्ष्मी की ताकत है, जो इस डायन का गला घोंट देती है। छीछालादर तो उन बेचारे गरीबों की हो जाती है, जिनके पास सिवाय बेबसी, लाचारी और आत्महत्या के अलावा कोई विकल्प मौजूद नहीं है। आखिर कब तक दुनिया में गरीबों को इस अग्निपरीक्षा से गुजरना होगा, कब तक हम सरक-सरक कर जिएंगे। मगर कुछ कर भी तो नहीं सकते, क्योंकि यह खाई तो बढ़ती जा रही है, कोई विकल्प गरीबी के आगे दिखाई नहीं देता है। जिंदगी की लीला यही अजगर, यही नागिन लील लेती है, और ऐसा जहर भर देती है कि जीवन भर उसे जीने नहीं देती है। परमाणु हमला तो फिर भी ठीक है, क्योंकि उसमें तो एक बार ही मरना पड़ता है, लेकिन इसमें तो पल-पल तिल-तिल कर तड़पना होता है, मरना होता है। गरीबों उठो, क्योंकि यहां कोई तुम्हारे लिए अवतार बनकर नहीं आएगा। सरकार और नेता तो भ्रष्टाचार की चादर ओढ़ कर कुंभकर्णी नींद सो गए हैं, उन्हें जगाने में तो युग निकल जाएंगे। अपने लिए तुम्हें ही करना होगा, क्योंकि अपने मरे ही स्वर्ग नसीब होता है। जब तक तुम आगे नहीं आओगे, डटकर इस गरीबी का सामना नहीं करोगे, यह तुम्हें अपनी गुलामी करवाती रहेगी, और तुम इसके सामने हथकड़ियों में जकड़े नजर आओगे। बस...अब ज्यादा सवाल नहीं, क्योंकि समय आ गया है, जब पेट न भरो, बल्कि गरीबी दूर करो। अगर यह कर लिया तो हम सदा के लिए मुक्त हो जाएंगे । किसी एक पीढ़ी को तो संघर्ष करना ही होगा, हमें विरासत में मिली गरीबी, लेकिन यह गरीबी को हटाया भी तो जा सकता है, इसका दम मिटाया भी तो जा सकता है । हर गरीब आज संघर्ष करे, सूरज के प्रकाश को भी रोका जा सकता है, बस हौसला होना चाहिए। इन वादियों और इस धरती से एक कसम लो कि अब गरीबी के आगे गिड़गिड़ाएंगे नहीं, बल्कि डटकर इसका मुकाबला करेंगे।

Thursday, August 19, 2010

भ्रांतियों का भ्रम घुप अंधेरा



यहां नदी है, नहीं यहां तो जमीन है, अरे नहीं जमीन जैसी कोई चीज ही नहीं है..., दूसरी ओर यहां खाई है, नहीं यह तो कुआं ही है, अच्छा मरीचिका...बिलकुल नहीं वहां तो पानी है ही...दिमाग वह शक्ति हो जो आसमां से जमीन तक का सफर तय करवाता है। जब यह दिल्लगी करना बंद कर दें तो समझ लो कुछ गलत होने वाला है और इसने क्रोध बाण चलाए तो फिर इसके आगे कर्ण का न तो कवच-कुंडल काम आएगा और न ही हनुमान का वज्र शरीर। विचारों की वल्गाएं यहीं से आसमां में गोते लगाती हैं, फिर तय होता है कि यह आसमां से समुंदर की गहराई को नापेंगी या फिर आसमान की हवा में ही भटकती रह जाएंगी। जिंदगी का पैमाना भी यही है और इसकी प्रायिकता भी। मगर दिमाग अगर एक बार कोई धारणा बना लेता है तो फिर वह रात को दिन भी कह सकता है और दिन को रात...इसमें हैरानी की कोई बात नहीं है। जिस पर यह मेहरबान होता है उसकी जिंदगी जानशीं हो जाती है और जिसके साथ इसकी लड़ाई हो जाती है, वह रणभूमि तो क्या गृहभूमि में भी धूल चांट लेता है। आक्रामकता आक्रांत को जन्म देती है, भय को देती है और जहां डर होता है, वहां जीत तो हो ही नहीं सकती। या ये कहें कि यह राम है तो वह रहीम। एक बारगी राम और रहीम तो गले मिल सकते हैं, लेकिन इन दोनों में कुछ भी संभव नहीं होता है। समाज जिन बेड़ियों में जकड़ा है, उसका बहुत पुराना और एकमात्र कारण यही है, बहुत हद तक देखा गया है, कि हम परंपराओं की पतंगे उड़ाया करते हैं, लेकिन इसमें कब कोई सियासत का कट मारकर हमें काट जाता है, हम नहीं जान पाते हैं। उस स्थिति में हमारे पास सिवाय पछतावे के और कुछ भी नहीं होता है। बड़ी भयानक स्थिति होती है वह जहां जिंदगी के सामने कई सुरंगनुमा रास्ते हों और उनके आगे अंधेरा छाया हो। यह विश्वास जरूर जगाया जा सकता है कि हर रात के बाद सुबह होती है और एक सूरज आता है, जो हमारी जिंदगी को दोबारा रोशन कर देता है, मगर इस बात को हम बार-बार क्यों भूल जाते हैं कि जब वह सूरज आता है तो वक्त और हालात दोनों बदल चुके होते हैं, हर गम से हमें ही समझौते की लाठी पकड़कर उसकी पूजा करनी होती है। यहां न तो आपका कोई हमदर्द होता है और न ही हितैषी। मगर हम आधी जिंदगी तो बिना डर के डर में काट देते हैं, जो असल जिंदगी या असल मायने में होता ही नहीं है, भले ही माउंटेन डियू का एड है कि डर के आगे जीत है, लेकिन किसी भी चीज के लिए जिद का होना तो जरूरी है, यही जिद आपकी मंजिल तय करती है, लेकिन यहां तो हम भ्रांतियों के भ्रम में ऐसे उलझे हैं कि उसके आगे हमें सिवाय अंधेरे के और कुछ नजर नहीं आता है। मजबूरी या तो हमारे परिवेश की रहती है या फिर हमारे संकल्प और साहस की। आत्मविश्वास हमारा इतना कमजोर रहता है कि वह कभी साहस का हाथ पकड़कर खड़े होने की कोशिश भी करता है तो गिर पड़ता है, यह कमियां हैं हमारी और समाज की। जब तक भ्रांतियों की बेड़ियों को हम तिलांजलि नहीं देंगे, हमारा कल्याण नहीं हो सकता। इस डर को जीतना ही होगा, वरना यह एक दिन हमें चबा जाएगा और हमारी जिंदगी को तबाह कर देगा। पहला काम यही करें कि हम भ्रांतियों पर विजय प्राप्त करें, अगर ऐसा करने में कामयाब हो गए तो समझ लो कामयाबी इस्तेकबाल करने खुद आएगी। अब तो इन भ्रांतियों पर वज्रपात करना ही होगा, क्योंकि यही से हमें विजयपथ पर विजयरथ की लंबी रेस लगानी है।

Wednesday, August 18, 2010

सूरज तूने ये क्या किया?


सहवाग आग बरसा रहे थे, एक के बाद एक अस्त्र ऐसे निकाल रहे थे की लंका मानो पूरी तरह से ढह रही थी, मन ही नहीं हौसले भी पस्त हो चुके थे। न तो कोई गेंदबाज असर कर रहा था और न ही कोई फील्डर। चतुरों की चतुराई भी काम नहीं आ रही थी, फील्ड पर जो उनका एक ग्रुप काम करता है, वह भी पूरी तरह खामोश हो गया था। आखिर सहवाग थे ही इतने धुआंधार। फिर लंका ने एक ऐसी चाल चली, जिसकी तर्ज थी कि सनम हम तो डूबे हैं, तुम्हें भी ले डूबेंगे। सूरज ने अपने नाम के विपरीत काम किया, और इसके लिए सबका दिल जीतने वाले दिलशान ने उन्हें प्रेरित किया। एक फीट आगे से नो बॉल कर डाली। चतुराई भी ज्यादा दिखा दी तो भला ऊपर बैठी तीसरी आंख कैसे यह ज्यादती होने देती। उसने फौरन मौका को ताड़ लिया और वह लंकाई चीतों के इरादे भांप गई। यह जो भी घटना हुई है, उसने लंका को शर्मसार जरूर कर दिया है, भारत ने मैच भी जीता और दिल भी। इंडिया एक हार के बाद कुछ करने के इरादे से उतरी थी, पिछले मैच में कीवियों से जीतकर लंका के हौसले तो बुलंद थे ही, साथ ही वो दादागिरी दिखाने के मूड में भी थे, लेकिन वो मूछों में ताव देते, इससे पहले ही भारतीयों ने उन्हें कतरना शुरू कर दिया। टीम को बुरी तरह हराने का सपना जो उनकी आंखों में तैर रहा था, उसने शुुरुआती पांच ओवरों में टूटता नजर आ गया। मगर झल्लाहट पूरे मैच के दौरान कभी कम होती नजर नहीं आई, हर लंकाई खिलाड़ी बौखला रहा था कि आखिर भारत ने उनके घर में घुसकर जो उन्हें पटकनी दी थी। मैच बुरी तरह हार रहे थे, ऐेसे में हर चीज उनकी पहुंच से दूर थी। आखिरी में एक दांव था, जिसमें सहवाग का शतक ही था, तो उन्होंने महज शतक न बनने देने की आग में इतने जल गए कि विवेक ही खो दिया। और क्रिकेट को कलंकित कर मर्यादाओं को भंग कर दिया। जी हां, उसने सभ्य क्रिकेट को दागदार कर दिया है। क्रिकेट में इससे भी अधिक कई दागदार पल देखे हैं , इसलिए अब टेंशन की कोई बात नहीं है, क्योंकि इस तरह की कई चीजें यूं ही फील्ड पर घटती रहती हैं, जिससे यह तो तय है कि अब इस खेल में जीत हार ही सबसे बड़ा मुद्दा हो गया। हम यह नहीं कहते कि भारत इसमें पूरी तरह से साफ है और वह इस तरह की कोई ओछी हरकत नहीं करता, लेकिन जब खेल ही है तो फिर आर पार ही खेलों, इस तरह सभ्यता का नकली जामा पहनकर उसे क्यों धोखे में रखा जा रहा है। सूरज पर कार्रवाई हो या न हो, लेकिन उसने अपने तेज को कहीं न कहीं कलंकित जरूर किया है, उनकी यह हरकत सालों तक लोगों के जेहन में रहेगी। हालांकि इसका परिणाम वो भी नहीं जानते थे, इसलिए यह बेवकूफी कर बैठे, मगर समय, प्रसिद्धि, ग्लैमर और बहुत सारी चीजों ने क्रिकेट की हवा को बदल दिया है, अब यह दूसरी करवट पर आ गया है, जिससे ताल से ताल मिलाना जरूरी है, हम पुराने रागों को अलाप नहीं सकते, क्योंकि आज चीजें पूरी तरह से परिवर्तित हो गई हैं, और अगर खुद को बदला नहीं गया तो हम पिछड़ जाएंगे। वैसे भी कहते हैं, इश्क और युद्ध में हर चीज जायज होती है, साम, दाम, दंड भेद, कुछ भी करो, आपकी जीत और हार को लोग याद रखते हैं , यह मैटर नहीं करता है कि आपने कैसे जीत हासिल की थी। इसलिए अब महत्वकांक्षी होना पड़ेगा, क्योंकि यही हमेें जीत की दहलीज से पार कराएगी। अन्यथा हम अन्य खेलों की तरह क्रिकेट में भी पटकनी खाते रहेंगे। बदलाव के साथ कदम से कदम मिलाना होगा, यह हादसा भी ज्यादा दिनों तक याद नहीं रखा जाएगा, क्योंकि बड़ी-बड़ी त्रासदियों को भी भुला दिया गया है। इस गुलशान में वही गुलजार होता है, जो आसमां में पहुंचकर चमकता है। इसलिए लंका की इमानदारी या बेइमानी उनके साथ, हमें तो बदला हुआ क्रिकेट खेलना है, क्योंकि हमारा अलगा मिशन विश्वकप 2011 है, जिसे हर हाल मेें भारत के पास लाना है।

Saturday, August 14, 2010

क्या आजाद हैं और क्या आजादी भी है?



कुर्बानी की वो गाथाएं जो हमने हमारे पूर्वजोें से सुनी हैं, वो गाथाएं जो आज भी हमारे रोंगटे खड़ी कर देती हैं, दिल को मचलने और दिमाग में जुनून पैदा कर देती हैं, जब सुनते हैं तो हमारा भी खून खौल जाता है, मन मचल जाता है, लगता है कि काश हम भी तब होते तो हमारी आजादी के लिए एक कतरा जरूर देते। तब भारत मां का ऋण जो हम पर आज है, उसे चुकाना हमारा फर्ज रहता..वह देशभक्ति का जुनून और वह समय ही हमारी मन को जय हो का नारा दे देता है, लगता है कि हम भी गांधी के साथ उस सभा में नारे लगाते रहते, भगतसिंह के साथ संसद में बम फेंकते और हंसते-हंसते फांसी पर लटक जाते, वाह जन्मभूमि पर कुर्बान होने के लिए तो मिलता...मगर...मगर...मगर यह क्या? हमारी आजादी को हम हरगिज भुला बैठे हैं और जो विरासत हमें संभाल कर दी गई थी या कहें संभालने के लिए आज उसकी हालत बहुत बुरी हो गई है, इस सोने की चिड़िया को हमने कब का बेच दिया है, आखिर हम हमारा देश किस ओर जा रहा है, हमने तो कभी नहीं सोचा था कि आखिर ऐसा कुछ हो, लेकिन भ्रष्टाचार की धारा हरे रामा हरे कृष्णा के वेष में आ चुकी है, जिसे पहचानना भी मुश्किल है, कालिया नाग अब यमुना में नहीं है, बल्कि लोगों के मनों में बैठा हुआ है और वहां से वार कर रहा है, इसलिए उसे मिटाया भी नहीं जा सकता है। हम तो बदलते युग की पहचान बनना चाहते थे, हम आजाद परिंदे थे और ऊंची उड़ान ही हमारा लक्ष्य था, लेकिन वह धरा ही भसक गई, क्योंकि उसकी जमीन में भ्रष्ट माटी लगा दी गई थी, जिसका धसकना तो लाजमी ही था। अब वह धसक गई है तो इसने देश की बुनियाद को ही हिलाकर रख दिया है। यह वक्त है सियासत का, यहां सियासत ने जो सितम ढाए हैं, उसने उन लोगों की कुर्बानी को जाया कर दिया है, जिसने देश के लिए न जाने कितने त्याग किए थे। मगर सियासतो के सौदागरों ने अपनी सत्ता के लालच से इसे मट्टी पलीद कर दिया है, आज अगर सबसे ज्यादा बू आती है तो इन्हीं सफेद कुर्तों वालों के पास से आती है, जिनके पास पूरा पॉवर है और उस पॉवर का इस्तेमाल इन गलत हाथों में है, आखिर क्यों यह देश के साथ खिलवाड़ क्यों किया जा रहा है, उसके साथ छलात्कार और बलात्कार किया जा रहा है, इसकी दुर्दशा दुर्दांत होती जा रही है, लेकिन इसकी चिंता किसी को नहीं है, गद्दारों की कमी नहीं है, इनके कारण ही देश के सितारे गर्दिश में चले गए हैं। आज अमेरिका, चीन, रूस, जापान हम पर राज कर रहे हैं, हम उनसे कोसों दूर हैं। हमारा न तो कोई हिस्सा है और न ही कोई हैसियत...आज उनके सामने हमें भिक्षकों की भांति खड़े रहना पड़ता है, क्या यह आजादी है या फिर यह आजादी है कि हमारे यहां हर अमीर गरीब पर शासन चलाता है, हर बड़ा अधिकारी नियमों का उल्लंघन करता है। हर नेता जनता को धोखा देता है और वादों की एक कमजोर नींव खड़ी करता है और वह उसके हाथ में सत्ता आने के बाद जमींदोज हो जाती है। आईएस से लेकर रुटिन अधिकारी तक जाने वालों की हालत बहुत ही खराब है, हर कोई इस भ्रष्ट सरिता में डुबकियां मार रहा है, मगर किसी को कोई परवाह नहीं है क्योंकि अपना काम बनता, भाड़ में जाए जनता। आज यह सब देखकर इस आजादी को मनाने का दिल नहीं करता है, क्योंकि हम आजाद हैं आजादी हमारे पास है, इस पर शक हो रहा है, हर कोई तो हम पर शासन करने में जुटा है, कभी महंगाई तो कभी विकास के नाम पर हमें ठगा जा रहा है, बावजूद हम सहने में लगे हैं और लग रहा है कि हमारा खून सूख चुका है। तो कैसी है यह आजादी और आखिर क्यों हमें इसपर गर्व हो, क्योंकि यहां गर्व जैसी तो कोई बात ही नहीं दिखाई देती है। यह दर्द है, अगर यहां से ऐसा लग रहा है कि हम गुलाम हैं, आजाद भारत में गुलाम...।

Wednesday, August 11, 2010

गर्दिश में हैं सितारे



किसमत ही है वह जो आदमी को राजा से रंक बना देती है, जमीं से आसमां तक पहुंचा देती है, कल तो जो गलियों की खाक छान रहा है, उसे बादशाह का ताज दिला सकती है। इसका कोई भरोसा नहीं है, क्योंकि यह कभी तो इतनी मुहब्बत लुटाती है कि दिल भर जाता है और कभी तो इतनी रुसवाई और बेवफाई देती है कि जिंदगी जहन्नुम से भी बद्तर हो जाती है। इसे भाग्य का फेर और समय का चक्र कहते हैं, और यह निरंतर बदलता रहता है। जिसके लिए यह होता है वह कालचक्र में विजेता बन जाता है और जिसके विरोध में घूमता है उसे कोई नहीं बचा सकता है। यह तेज भी है और तर्रार भी। इसके वार की आवाज नहीं आती है और इसकी रहमत को कोई चुनौती भी नहीं दे सकता है। जब यह मेहरबान होता है तो खुद जमीं और आसमां तुम्हारे कदम चूम लेते हैं और जब धोखा देता है तो दर्द भी तुम्हारा दामन छोड़ देता है। कुछ यही हुआ है किसमत के धनी धोनी के साथ। जब वो आए थे तो उनके सितारे बुलंदियों पर थे। वो बल्ले को हाथ भी लगा दें तो वह छक्के पर छक्के उगल देता था। उनकी मौजूदगी ही उनके विरोधियों को जमीं चटा देती थी, लेकिन वक्त और हालात किसी के गुलाम नहीं होते हैं, इनकी चाल तो हर वक्त बदलती रहती है। बस यही हुआ है धोनी के साथ। जो कल तक अपने सितारों के दम पर जीत का सेहरा पहनते थे, आज वही सितारों ने उनका साथ छोड़ दिया है। आज टीम की बुरी गत हो गई है, टीम को नंबर एक का ताज दिलाकर क्रिकेट का नया बादशाह बनाने वाले धोनी अब उसे गर्त में ले जा रहे हैं। जिस तरह से टीम इंडिया के फजीते हो रहे हैं, उसने निश्चय ही उसके भविष्य पर तो सवालिया निशान लगा ही दिए हैं, साथ ही विश्वकप का संकट भी खड़ा कर दिया है। टीम का मनोबल पूरी तरह से खाई के अंदर घुसा हुआ है, जहां सिर्फ अंधेरा ही अंधेरा है, और सूरज की कोई किरण वहां नहीं जाती दिखाई दे रही है। टीम अपने पट्टे पिचों पर तो जोरदार धमाल मचाती है और तीन सौ रन का अंबार लगा देती है, लेकिन जब थोड़ी तेज पिच मिलती है तो ये बैट पकड़ना ही भूल जाते हैं। अगर देखा जाए तो इस समय टीम को देखकर लगता ही नहीं कि यह टीम विश्वकप खेलने के लायक है। जो कार्य कई साल पहले या कई महीनों पहले से हो जाना चाहिए, वह अभी तक नहीं हुआ है। टीम में न तो खिलाड़ी कन्फर्म दिखाई दे रहे हैं और न ही जीत की कोई उम्मीद। टीम के पास ऐसा कोई भी गेंदबाज नहीं है, जिसे विश्वकप के लिए पक्का कहा जा सके। किसी के पास स्टेमिना ही नहीं है कि वह सात ओवर एक साथ डाल दे। न तो फास्ट बॉलिंग ठीक है और न ही स्पिन। एक ही गेंदबाज को ुटीम इंडिया का जमाई बना रखा है, वहीं तीन-चार गेंदबाजों को फ्लॉप होने के बावजूद दांव खेला जा रहा है, आखिर गधे पर आप कितनी ही मेहनत कर लो, लेकिन वह कभी घोड़ा नहीं बन सकता। ठीक हालात टीम इंडिया के हैं, वह इस समय बेदम पड़ी हुई थी, अब आखिर कैसे टीम ऊपर आएगी और नहीं आई तो क्या होगा देश के ख्वाब का, क्या हमारे लिए विश्वकप एक आस ही बनकर रह जाएगा। क्या सचिन ने जो सपना देखा है वह पूरा हो पाएगा। जिस तरह के हालात हैं, उसे देखकर तो नहीं लगता। हम क्रिकेट में बहुत पिछड़ गए हैं और अगर एक-दो माह में कठोर निर्णय नहीं लिया गया तो निश्चय ही हम विश्वकप लाने के लायक नहीं रहेंगे। और रहा सवाल क्रिकेट के भगवान को, तो वो भी कुछ नहीं कर पाएंगे, क्योंकि उनकी सेना में ही वो बल नहीं है। इसलिए जरूरी है कि कुछ माह के लिए भ्रष्टाचार को तिलांजलि देकर सिर्फ क्रिकेट खेलना होगा, और अगर हम पूरी शिद्दत से खेलते हैं तो जीत मिले न मिले, हार शर्मनाक नहीं होगी।

Monday, August 9, 2010

सितमगार सियासत

जनता का क्या हो रहा है, उसे महंगाई डायन चबा रही है, या फिर नक्सली हिंसा लील रही है। देश में कोई आतंकवाद का अजगर आकर दिनदहाड़े न जाने कितनों को निगल कर चला जाए, कोई भी भयंकर तबाही मचा दे, मगर यहां तो सनम की तरह बेवफा सरकार हो गई है और सितम पर सितम ढाए जा रही है। कौन किसके लिए और क्यों परेशान होगा, कोई नहीं जानता, क्यों किसी के लिए कोई तड़पेगा.... इन सबके लिए कोई परेशान नहीं है। क्योंकि आज सब अपने लिए जी रहे हैं, तो कौन यहां तो लोग मरे, इन्हें क्या। सियासत के ये सौदागार तो सिर्फ सौदेबाजी करने में जुटे हैं, इन्हें कोई मरे इससे क्या, इनके घर में उजाला रहना चाहिए। अगर वह नहीं रहा तो हाहाकार मच जाती है, वरना तो कुछ भी हो जाए, इनके कानों में जू तक नहीं रेंगती है। जिस तरह से महंगाई ने आम आदमी को मार डाला है, उसी प्रकार कश्मीर जल रहा है, मगर इसकी परवाह किसी को नहीं। हर सियासतदार अपनी सियासत चमकाने में जुटा हुआ है और जितना हो सके माल अंदर करने में। कश्मीर में यह गंदी राजनीति वहां की वादियों को दूषित कर रही हैं। वहां लहू बरस रहा है, पर ये लोग तो अपनी दादागिरी और सियासत बचाने में लगे हैं। इंसान तड़प रहा है और ये लोग चांदी काटने में जुटे हुए हैं । केंद्र से लेकर राज्य और शहर स्तर की राजनीति का स्तर स्तरहीन हो गया है। मजबूरियों को आम आदमी के हवाले कर दिया है और खुशियों को ये लोग भगा कर ले गए हैं। कश्मीर ही नहीं जल रहा है, दूसरे राज्यों का भी यही हाल है , हर ओर तबाही ही तबाही है, नक्सलवाद न जाने कितनी जानें ले रहा है, पर परवाह कहां... आखिर दोषी भी तो कोई नहीें बनता है, क्योंकि जो दोषवान है उसके हाथ में ही तो कमान है और जब कोई आपत्ति आती है, तो वह उसे खींच देता है। भई देश का बुरा हाल है, जनता यहां हाल बेहाल है, कौन किसके लिए मरेगा और कौन किसके लिए जिएगा, इससे किसी को लेना देना नहीं है। देखा जाए तो अपनी जेबें भरे और बाकी कोई लेना देना नहीं है। नक्सलवाद ने छत्तीसगढ़ को लील लिया है, यहां पुलिस की खैर मना रखी है, मगर इन पर कार्रवाई की जगह खानापूर्ति हो रही है। इस भयावह समय में आखिर न तो सरकार जिम्मेदारी लेती है और न ही कोई लेना चाहता है। इससे ही बर्बाद हो रहा है देश। यहां सभी नेता भ्रष्ट चोर हो गए हैं, हर किसी को सियासत दुधारू गाय नजर आ रही है। सभी दुह लेते हैं। इन सबके पीछे हर कोई चुप्पी बांधे बैठा है, तड़प और तरस रहा है तो वह है आम आदमी। उसकी पुकार सुनने के लिए किसी ने अपने कान नहीं खोल रखे हैं, इसकी न तो किसी को फिक्र है और न ही किसी को चिंता। सब अपनी मर्जी के मालिक बन बैठे हैं, जनता ने जिस उम्मीद से उन्हें उस मुकाम तक पहुंचाया था, वो वहां के खुद को सेवक नहीं बादशाह समझने लगे हैं और जनता को जर्नादन नहीं, बल्कि अपना गुलाम मान बैठे हैं। ऐसी स्थिति में विरोध के ज्वर निकलना तो स्वाभाविक ही थे, इसे कौन रोक सकता था। जहां नजर जा रही है वहां समुंदर की तरह पानी ही पानी नजर आ रहा है, मगर यह पानी भ्रष्टाचार का है, जिसमें सब डुबकी लगाने में जुटे हुए हैं। अब इतना सब हो रहा है, पर कोई सांस तक नहीं ले रहा है, बल्कि ऊलजुलूल बयान देकर लोगों को उकसााया जा रहा है, शांति और भ्रष्टाचार को बढ़ावा दिया जा रहा है। इन सबके चलते आखिर भारत समस्या से घिरी वह जोरू नजर आ रही है, जिसके सभी मालिक हैं और सभी उसके साथ छलात्कार करने में जुटे हैं।

Monday, August 2, 2010

बचा लो इस जन्नत को


- यह जन्नत भी है और जहन्नुम भी
अगर आप भगवान पर विश्वास करते हैं तो आपको शैतान पर भी विश्वास करना ही होगा...यह बात आज से कई साल पहले एक हिंदी फिल्म में कही थी, निश्चय ही यह सही है, क्योंकि जहां पॉजिटिव होता है, वहां निगेटिव भी होगा। यह वैज्ञानिक सत्य है और इसे कोई झुठला नहीं सकता है। यहां न्यूटन के तीसरे नियम पर भी प्रकाश डालना चाहूंगा, जिसमें लिखा हुआ है कि प्रत्येक क्रिया के बराबर विपरीत प्रतिक्रिया होती है, यह भी सत्य है, उसी तरह जहां खूबसूरती होती है कांटे भी वहीं होते हैं, यह प्राकृतिक रूप से भी सत्य है, क्योंकि गुलाब की हिफाजत के लिए कांटे हैं और कोई उसे आसानी से मसल न दे, लेकिन यहां तो बात कुछ और ही है...जी हां, हम बात कर रहे हैं इस धरती की जन्नत की। इस वाक्य से आप समझ गए होंगे कि हमारा इशारा किस ओर है, बिलकुल सही...कश्मीर की बात हो रही है जी...धरती की इस जन्नत में हर कोई जीना चाहता है, यहां रहना चाहता है, वो बहुत खुशकिस्मत हैं, जिन्हें यह नसीब हुआ है, वरना तो कुछ अभागे ऐसे भी हैं, जिन्हें इस जन्नत की जमीं नसीब ही नहीं हुई है। मगर इस जन्नत में ये क्या हो रहा है, यहां की खूबसूरती के पीछे का काला दाग उसे लील रहा है, यहां की वादियां जल रही हैं, घाटियों में आग निकल रही है, यह हाहाकार कैसा, यह विचलन कैसी, यह लोग क्यों बिलख रहे हैं, कहां तड़प रहे हैं, यहां की धरती लाल क्यों है, हवा बेचैन क्यों है, न जाने इस सन्नाटे के पीछे कैसी तबाही है, क्यों तड़प रहा है कश्मीर, क्या हो गया है इसे? आखिर क्या कारण हो गए हैं कि देश का यह टुकड़ा देश के दिल से टूट रहा है, लोगों को यहां पैदा होने पर दु:ख क्यों हो रहा है..., इन सवालों के जवाब मिलना तो मुश्किल है, लेकिन जो कुछ भी कश्मीर में हो रहा है , वह कहीं न कहीं देश और जम्हूरियत के हित में नहीं है। जिस तरह से लोग अपने फायदे के लिए यहां ज्वालामुखी भड़का रहे हैं, वह बेहद चिंता का विषय है, जिन लोगों के मासूम चेहरे बर्फ की तरह स्वच्छ दिखाई देते हैं, उनके अंदर इतना खौफनाक शैतान कैसे प्रवेश कर सकता है। अब तो यहां के हालात देखकर डर सा लगने लगा है, साथ ही हैरत भी होती है कि क्या लोग इतने स्वार्थी भी हो जाते हैं, कि यहां तक गिर जाते हैं। जो आग इस समय जम्मू-कश्मीर में जल रही है, उसका अंत तो नहीं, बल्कि उसमें लगातार घी डाला जा रहा है, लोग मुहब्बत के इस शहर में नफ्रत की बीच बो रहे हैं और यहां अंगार पैदा हो रहे हैं। तो क्या हालात हमेशा ऐसे ही बने रहेंगे, निश्चय ही हम कितना ही लिख लें, जागरूकता लेकर आ जाएं, जब तक आवाम नहीं समझेगी, तब तक कुछ नहीं होगा, क्योंकि सियासत के यह सौदागर अपनी गद्दी के लिए इसे जलने के लिए आग में छोड़ देंगे और उनका कोई मिशन नहीं है कि यहां पर शांति आए। मगर देश की रक्षा तो हमारा ही फर्ज है और उस जन्नत को संभालना न सिर्फ उन कश्मीरियों की जिम्मेदारी है, बल्कि दिल्ली में बैठी सरकार का भी फर्ज है। जब गांधी परिवार को सत्ता का मोह नहीं है, सोनिया जैसी लीडर जो पद की लालसा नहीं रखती तो वे कश्मीर को लेकर कोई सख्त कदम क्यों नहीं उठाती, और देश में हिंदुत्व का झंडा लहराने वाली पार्टी इस कश्मीर में शांति के लिए कोई प्रयास नहीं करती। इसे तो सिर्फ फालतू लोगों को पीटकर अपनी ताकत का गलत इस्तेमाल करते आता है। यहां मैं सभी से गुजारिश करना चाहूंगा कि बचा लो इस जन्नत को, जो आज जहन्नुम बनने की कगार पर खड़ी है, यहां कोई अवतार नहीं होगा, जो भी करना है बस हमें ही करना है, आगे भी हमें ही आना होगा, कश्मीर में लगी आग को बस अब बुझाना होगा, वरना यह आग बढ़कर पूरे भारत को लील जाएगी।

Friday, July 23, 2010

कौन वैश्या और कौन संत



यहां तो बाजार है, और यहां तरह-तरह के लोग रहते हैं। तो यहां भगवान धर्मात्मा भी लोगों को दिखाई दे जाते हैं, तो पापी भी पुण्य की वैतरणी को गंदा करने की जुगाड़ में जुटे रहते हैं। तो किसे मान लिया जाए कि कौन यहां संत है और किस पर सारा दोष मढ़ दिया जाए। यहां समाज का परिदृश्य किसी से छिपा नहीं है, क्योंकि बात जब होती है कि आखिर समाज की गंदगी है कौन, समाज को बिगाड़ किसने रखा है, किन कारणों से बॉलीवुड, राजनीति या अन्य किसी बिजनेस कंपनी में तरक्की के रास्ते तय किए जाते हैं। प्रथम दृष्टया तो यह कहा जाता है कि इन्होंने सीढ़ी का इस्तेमाल किया और इस इस्तेमाल में कहीं न कहीं वैश्या बनना पड़ा है। हां, यह जरूर हैं कि कुछ इस धंधे को सरेआम सबके सामने करती हैं तो वो वैश्याएं कहलाती हैं और जो इन्हें छिपकर करती हैं, वो इज्जतदार जिंदगी जीती हैं, चलों यह तो उन महिलाओं के लिए हो गया, जिन्हें इस तरह के कृत्य में उतरना पड़ता है, हां कई बार उनकी मजबूरी हो सकती है, और कई बार विलास जिंदगी के लिए वो ऐसा करती हैं, और कुछ की भूख इतनी ज्यादा रहती है कि वो इस तरह के धंधे को करती हैं। तो क्या यह मान लिया जाए कि यहां पर पग-पग में वैश्याएं हैं, अगर इसके समर्थन में लोग आते हैं तो यह भी कहा जाएगा कि यहां कोई संत नहीं है। हर कोई उस स्त्री का हनन कर उसे वैश्या बनाने पर तुला है, बस फर्क यह है कि कोई पैसों से उसे चादर में छिपा लेता है और कोई पैसा देकर उसे बदनाम कर देता है। वक्त बड़ा बदमाश और धोखेबाज होता है, यह जिंदगी के साथ कब बेवफाई कर दे, कोई नहीं जानता। यहां किसे वैश्या माना जाए, उसे जो सरेआम अपना जिस्म इसलिए बेचती है, क्योंकि उसे पैसा चाहिए। यहां नजरिए का फर्क है, क्योंकि वह इसे वैश्यावृत्ति नहीं, बल्कि वह उसे उसका कार्य मानती है और उसकी वकालत करते हुए कहती है कि आखिर किस तरह वह अपना कार्य बड़ी शिद्दत से करती है। उसके अनुसार कोई कार्य बुरा नहीं है, भले ही वह अपना जिस्म बेच रही है, लेकिन छुपा तो नहीं रही, साथ ही यह उन लोगों की भी मदद है जो कहीं न कहीं अतृप्त आत्माएं हैं... हालांकि समाज इसे बुरा कहता है, मगर ये बुरी नहीं हैं...वहीं छिपी हुई वैश्याएं...जो अपनी तरक्की की सीढ़ियां चढ़ जाती हैं...पर यहां तो कई बार उन्हें मजबूर किया जाता है और कई बार वो स्वयं ही बिछ जाती हैं। तो क्या इन्हें वैश्याएं कहेंगे। यह बड़ा सवाल है, सवाल यह भी है कि ये वैश्याएं कैसे हुई, क्योंकि इसके लिए तो वो दुर्दांत लोग जिम्मेदार हैं, जो इन्हें वैश्याएं बनाते हैं, उनके हस्तक्षेप के बिना ये वैश्याएं तो नहीं हो सकती, और न ही कोई जन्म से वैश्या पैदा होता है, इन्हें यह समाज ही वैश्या बना देता है, वह पुरुष इन्हें वैश्या करार करवाता है, क्योंकि इसके लिए वह ही जिम्मेदार है, जब तक वह इन्वॉल्व नहीं होता, महिला वैश्या कैसे बन सकती है। तो फिर यह समाज इन महिलाओें को ही वैश्या क्यों कहता है, या फिर उन पर ही लांछन क्यों लगाता है। आखिर उस पुरुष को कठघरे के घेरे में क्यों नहीं लिया जाता है, जो इसके लिए मूल रूप से जिम्मेदार होता है। इन तीनों मेें देखा गया है कि पुरुषा साफ रूप से संत बनकर निकल जाता है, जबकि रोग उसने ही किया है, और उस स्थिति तक पहुंचाने के लिए जिम्मेदार भी वही है, दरअसल यह पूरा खेल पुरुषवादी समाज के चलते हो रहा है, जहां महिलाओं पर अत्याचार किया जाता है, अपना दोष तक उन पर मढ़ दिया जाता है और बाद में उन्हें दोषी करार कर उन्हें सजा भी दे दी जाती है। और महिलाओं को उन्हें मानना भी पड़ता है....तो प्रश्न आपके लिए है आप ही निश्चय कीजिए कि कौन वैश्याएं हैं, कौन संत है, और इन सबका कारण किसे दिया जाना चाहिए।

Thursday, July 22, 2010

इनका बस चले तो भारत का नाम ही मराठी कर दें


शिवसेना की उग्रता दिन- ब-दिन लोगों की जिंदगी में खलल तो डाल ही रही है, साथ ही देश के ऊपर एक तानाशाह शासन करने की कोशिश कर रही है। पहले बाला साहेब ठाकरे, इसके बाद राज ठाकरे जिस तरह से सरेआम गुंडागदी कर रहे हैं, निश्चय ही उसने देश की व्यवस्था के ऊपर कालिख पोत कर रख दी है। ये नेता, कम गुंडे बनकर देश के नियमों की धज्जियां उड़ा रहे हैं, और सत्तासीन धृतराष्ट्र की भूमिका में नजर आ रहे हैं। आखिर वो कौन सी ताकतें हैं जो राज के कद को इतना बड़ा बना दे रही हैं कि हाइकमान सोनिया और प्रधानमंत्री साहब कोई कदम नहीं उठा रहे हैं। जिस तरह से मुंबई में इन लोगों ने आतंक मचा रखा है, वह किसी से भी छिपा नहीं है। वहां जब मर्जी होती है शिवसेना के गुंडे आते हैं, लोगों की पिटाई करते हैं और मनमानी वसूली करते हैं। साथ ही साथ अपने फैसले दूसरों पर थोप देते हैं। कुछ दिनों में माहौल देखकर तो ऐसा लग रहा है कि इनकी मर्जी के बाद ही दूसरों के घरों की औरतें कपड़े पहनेंगी। राज ठाकरे बेदह गुंडा तत्व है और उन्हें, कार्यकर्ताओं सहित रोकने की जरूरत है, क्योंकि जिस तरह से उन्होंने मुंबई की वॉट लगा रखी है और मराठी हित के नाम पर राजनीति के दांव-पेंच चल रहे हैं, वह न तो मराठियों से छिपा है और न ही देश की जनता से। जब देश के संविधान ने जाविाद और क्षेत्रवाद का कोई विकल्प नहीं बनाया तो वो आग लगाकर घी क्यों डाल रहा है। विडंबना तो अब होगी, जब बैंकों को निर्देश दिए जाएंगे कि सभी बैंके अपने नाम मराठी में लिखें, चूंकि शिवसेना का मामला है और अगर ऐसा नहीं करते हैं तो निश्चय ही बैंक में तोड़-फोड़ होगी, इसलिए प्राइवेट बैंकें तो फटाफट अपने नामों के होर्डिंग मराठी में करने का मन बना रहे होंगे। मगर यह क्या? क्या इस देश की कल्पना हम कर रहे हैं, क्या ऐसे देश मेें हमें जीना भा रहा है, जहां कुछ लोग अपने हितों को साध रहें हैं। वक्त हाथ से सरपट निकला जा रहा, और शिवसेना का आतंक भी। ऐसे में अगर इसे यहीं नहीं रोका गया तो आने वाले दिनों में सर्प अजगर बन जाएगा और तब डसेगा नहीं, सीधे ही लील जाएगा। आखिर तानाशाही का अंत होना चाहिए और जब तक पुलिस के लोग उनके पिद्दे बने रहेंगे, नेता अपनी कुर्सी पकड़े रहेंगे तब तक ऐसा नहीं हो सकता है। जरूरत है सख्त कदम उठाने की, शिवसेना को सबक सिखाने की, वरना यह संगठन देश के लिए वह काला अध्याय लेकर आएगा, जिसकी अभी तक कल्पना भी नहीं की होगी। ये लोग इतने उग्र हो गए हैं कि हर चीज को मराठी बनाना चाहता है। आज भाषा पर वार किया, लोगों पर वार किया, स्वतंत्रता पर वार किया, फिर भी इनके दुशासन को रोका नहीं गया, अब भी अगर हम मौन साधे बैठे रहे तो कल यह भारत का नाम बदलकर मराठी रखने में भी नहीं हिचकिचाएंगे...और तब भी कोई कुछ नहीं कर पाएगा। इसलिए जल्द से जल्द इस बेबसी और लाचारी की चादर को बाहर फेंकना होगा, क्योंकि मराठावाद देश की संप्रभुता के लिए एक खतरा दिखाई दे रहा है। खासकर शिवसेना द्वारा जिस तरह से भोले-भाले मराठियों को बहकाकर उनका इस्तेमाल कर सत्ता की सीढ़ियां चढ़ने की कोशिश की जा रही है, वह सब जानते हैं। ऐसे में मराठी लोगों को भी विरोध करना होगा, क्योंकि अपराधियों का साथ देना कर्त्तव्य नहीं है, और यह नियम के विरुद्ध भी है, इस पर विशेष गौर करना होगा। उन्हें अपना एक दिग्दर्शन स्वयं इस्तेमाल करना होगा, क्योंकि ऐसा नहीं हुआ तो निश्चय ही मराठी पूरे देश के लिए नासूर बन जाएगा, तब कुछ नहीं किया जा सकेगा।

Wednesday, July 21, 2010

मुरली की तान पर विकेट दौड़े चले आते हैं...



हमने अभी तक सुना था कान्हा की बांसुरी इतनी सुरीली थी कि गाएं दूध देना शुरू कर देती थीं, गोपियां नृत्य करने लगती थीं। कहीं दूर कोई हो तो वह मुरली सुनकर दौड़े चले आते थे। कुछ ऐसा ही श्रीलंका के गेंदबाज मुथैया मुरलीधरण के साथ भी दिखाई देता है। क्रिकेट का ब्लैक जादूगर के पास वह करिश्माईकलाईहै, जिसने पूरे विश्व के नाक में दम कर रखा है। पिछले दस-बारह साल में इसके कद को कोई भी छू नहीं पाया है। साधारण सा चेहरा, हमेशा मुस्कान रहने वाला जब यह खिलाड़ी मैदान पर उतरता है तो यह और खूंखार हो जाता है। गेंदों तो इसके इशारे पर नाचती हैं, और जब मुरली की तान बजती है तो समझ लो विकेट दौड़े चले आते हैं, जब यह दहाड़ता है तो फिर श्रीलंकाई शेरों के आगे कोई टिक नहीं सकता है। सालों से यह जादू देखने के लिए क्रिकेट प्रेमी तरसते हैं, विरोधी टीम वाले भी इस बाजीगर के कायल हैं। क्रिकेट के लिए हमेशा 101 प्रतिशत देने की तत्परता ही इस मुरली को दूसरों से अलग करती है, कई बार उनकी कलाई पर कम बुद्धि वालों ने सवाल खड़े किए, मगर सच तो आईने की तरह होता है और उसे झुठलाया नहीं जा सकता है, ठीक वही हुआ और मुरली बेदाग होकर निकले, और खूंखार बनते चले। एशिया से लेकिन अफ्रीका हो या फिर आॅस्ट्रेलिया, इनकी टक्कर का कोई खिलाड़ी नहीं है। अगर स्पिन की जादूगरी और बुलंदी को नापें तो दो खिलाड़ी ही विश्व में आते हैं, पहले मुरलीधरन और दूसरे शेनवॉर्न। अगर यहां यह कहा जाए कि जिस तरह बैटिंग में भगवान सरडॉन बै्रडमैन थे, उसी तरह बॉलिंग का कोई सर डॉन ब्रैडमैन है तो वह मुरली ही है। इनके खेल में वो जादू है कि लोगों को दीवाना बना दे, हर कोई इनकी तारीफ करता नहीं थकता। आॅफ द फील्ड भी इस खिलाड़ी का कोई जोर नहीं है, लेकिन यह इस शहंशाह ने अब टेस्ट क्रिकेट से अलविदा कहने का निर्णय लिया है। हालांकि गाले टेस्ट उसका आखिरी टेस्ट है, लेकिन आज भी धोनी जिस गेंद पर आउट हुए हैं, वह अद्भुत गेंद थी। इनकी तरकश के तीर देखकर कई बार तो स्वयं मुरली भी अचंभित हो जाते हैं, वाह क्या गेंदबाज है, लेकिन अब यह हमें ज्यादा देखने को नहीं मिलेगा, यह श्रीलंका ही नहीं पूरे विश्व के लिए एक दु:खद समाचार है। श्रीलंका टीम तो सूनी हो जाएगी, क्योंकि इनकी जगह भरना काफी मुश्किल है। इस बुलंद बादशाह के उफान और विदेशी टीमों को नाकों चने चबवा देने वाला यह गेंदबाज का शौर्य अतुल है, उसका कोई सानी भी नहीें है, बस दिल में मलाल यही रहेगा कि अगली बार श्रीलंका टीम खेलेगी तो उसमें मुरली नहीं होंगे, तब शायद दूसरी टीमें राहत की सांस लें, लेकिन जिन्हें मुरली भातें हैं वह तो दु:खी ही होंगे। बस इस बादशाह के सन्यास पर ऐसी विदाई देनी चाहिए, कि जाने का दु:ख न हो?

Monday, July 19, 2010

उनका क्या कसूर था...


ेउनकी शादी अभी-अभी हुुई थी और वो मां के दर्शन के बाद जीवन की शुरुआत करना चाहते थे, इसलिए वो उस टेÑन में सवार थे। एक भाई बॉर्डर से बहुत दिनों बाद छुट्टी मिलने पर अपने घर अपनी मां-बाप और बीवी से मिलने जा रहा था। एक युवा जो अपने जीवन के 25 बसंत पढ़ाई करते-करते बिता देने के बाद वह अपने सपनों को पूरा करने के लिए नौकरी करने जा रहा था। एक भाई अपनी बहन से मिलने जा रहा था। लेकिन इन सबका मिलन अधूरा रह गया, क्योंकि जिस जिंदगी में खुशियों के लिए ये लोग जा रहे थे, वहां से इन्हें मौत मिली। और इस मौत के बाद इनके साथ जुड़े कई लोगों को गम का साया जिंदगीभर के लिए मिल गया। जी हां... ये वो लोग हैं जो कर्मभूम में बैठे हुए थे और नींद ले रहे थे, लेकिन उन्हें क्या पता था कि बीती रात जब वो नींद के आगोश में जाएंगे तो वहां से वापस ही नहीं लौटेंगे। हुआ ही कुछ इतना दर्दनाक, टेÑन हादसे ने उनकी जिंदगियां तबाह कर दी। अब इसे तो इत्तेफाक कह सकते हैं क्योंकि हादसों पर तो किसी का जोर नहीं चलता, लेकिन बार-बार लगातार हो रहे हादसों के लिए कोई न कोई तो जिम्मेदार होगा ही। कहीं न कहीं पटरियों की लचर व्यवस्था, भ्रष्टाचार, कार्य प्रणाली और जिंदगियों को महत्व न देना। अगर देखा जाए तो ममता बेनर्जी ने बजट के समय में उम्मीदें तो खूब जगाई थीं, ममता भी खूब लुटाई थी, लेकिन वे सब धरी की धरी रह गई, उनकी ममता मुसीबत बन गई, उन्होंने राहत की रेवड़ी तो बांट दी, लेकिन सुरक्षा के मामले में जरा 17 ही साबित हुई, नतीजा यह हुआ कि जब से ममता ने कार्यभार संभाला है, टेÑनों की दुर्घटनाएं बहुत बढ़ गई हैं, और हर बार जांच के नाम पर जिम्मेदारों को छोड़ दिया जाता है। इतने टेÑन हादसे हुए, इतने लोगों की जानें गई और इतनी जांचें बैठी, लेकिन उन जांचों में से कौन सी पूरी हुई, इसके बारे में शायद हम भी नहीं जानते हैं, तो गलती किसकी है, क्या उस व्यक्ति की जो उसमें सवारी करके अपनों तक पहुंच रहा है या फिर उनकी जो उनका इंतजार कर रहे हैं। पहली नजर में देखा जाए तो यही दिखाई पड़ रहा है, लेकिन जितनी आसान स्थिति हम समझ रहे हैं, वैसा है नहीं, क्योंकि यहां पर पूरा रेल प्रशासन जिम्मेदार है, चपरासी से लेकर मदरासी तक, उन्हें क्या फर्क पड़ता है, दूसरों के घरों में मातम मनने पर कोई दु:ख नहीं होता, दर्द तो तब होता है, जब वह अपने घर में हो। रेलवे जिस तरह से लचर व्यवस्था से चल रहा है, वह निश्चय ही चिंता का विषय होना चाहिए। मगर मैडम ममता को तो राजनीति के जोड़-तोड़ से ही फुर्सत नहीं मिलती है तो वो इस पर क्या ध्यान देंगी। जब कभी भी कोई हादसा होता है तो वो दौरा कर राहत बांट देती हैं और मामले की जांच होगी, दोषियों को छोड़ा नहीं जाएगा, जैसी बातें कहकर मामले को ठंडे बस्ते मेें डाल देती हैं। कभी भी रिजल्ट सामने नहीं आया और मौतों का सिलसिला लगातार जारी है, इसके लिए कहीं न कहीं लापरवाही भरा रवैया ही है, जो जिंदगी को कुछ नहीं समझता है। आखिर इन मौतों की कीमत ममता को इस्तीफा देकर चुकानी होगी, क्योंकि यहां 50 से अधिक मौतें हो गई हैं और न जाने कितने घायल तो ऐसे में स्थिति स्पष्ट है कि उनसे कार्य संभल नहीं रहा है, वो दस जनपथ के चक्कर लगाने में ही बिजी हैं, ऐसे लोगों को जिम्मेदार पदों से फौरन हटा देना चाहिए, क्योंकि यहां पर किसी की मौत और किसी की जिंदगी का सवाल रहता है...और अगर संभला नहीं गया तो इस तरह के हादसे होते रहेेंगे और उन्हें दुर्भाग्यवश करार देकर टेÑनें मौत बनकर पटरी पर दौड़ती रहेंगी।

Sunday, July 18, 2010

आंखें भर आईं



वह मासूम सा चेहरा, जिसमें ईश्वर की पाकीजगी थी, वह जो सदा खिलखिलाता था। चिड़ियों के पंख लगाकर सदा आसमान की ओर उड़ना चाहता था। हर किसी को खुशी बांटती चलती थी वह। वह ओस की बूंद की तरह थी, लेकिन उसका हौसला आसमान की तरह विराट था। सृजन उसका कार्य था, चेहरा देखते ही लोग गमों को भुला देते थे, लोग उसके कायल थे। हर कोई उससे प्यार करता था, बेटी जो थी वह। जमाने की करवट न तो 20 वीं सदी की थी और न ही 21वीं सदी की। यह युग था 25वीं सदी का। यहां उसका सम्मान किया जा रहा था। न तो उसे गर्भ में मारने की कोशिश की गई और न ही स्कूल जाने से रोका गया। बचपन में उसके कंधों पर दूसरे भाई को खिलाने का बोझ भी डाला नहीं गया। वह उसकी मर्जी से उन्मुक्त गगन की सैर कर सकती थी, भाई की तरह खेल सकती थी, न उसे मां का डर था और न ही उसे पापा का खौफ। बड़ी होकर जब वह ससुराल जाएगी तो उसे दूसरों के घर जाकर चूल्हा-चौका करना होगा, जी नहीं! इसलिए उसे काम करने और खाना बनाने की भी कोई चिंता नहीं थी। वह तो खूब पढ़ रही थी, हर कोई उसे फरिश्ता और देवी का अवतार मानने लगा था। पुरुष से लेकर परिवार कोई भी पग-पग पर चुनौती बनकर नहीं खड़ा था। यहां न तो उसके साथ कभी कोई छेड़छाड़ करता और न ही उसे डराने या धमकाने की कोशिश करता। परंपराओं की बेड़ियां कभी उसकी राह का रोड़ा नहीं बनी, कभी उसे लड़की होने का दु:ख नहीं दिया गया, बल्कि उसे इस बात का गर्व दिलाया गया कि तुम नारी हो, शक्ति हो, किसी की बेटी हो, किसी की बहू बनोगी, किसी की पत्नी बनोगी और किसी की मां बनोगी। संसार तुम्हारे सृजन से ही आगे बढ़ेगा और तुम ही इस धरा की देवी हो। वाह वह बेटी भी कितनी खुश थी जो अपनी दादी से हमेशा सुनती थी कि उनके समय में औरतों पर कितने जुल्म होते थे, वहां बेचारी वह जिंदा पूरी जिंदगी अगर जी जाएं तो ही आश्चर्य होता था। आज हालात और परिस्थितियां दोनों अनुकूल नहीं है, इसके बावजूद सब लोग जी रहे हैं, मगर स्त्रियों के रूप में यह पूरी तरह हाल बदल गए हंै, अब उनके पैदा होने पर न तो परिवार को दु:ख होता है और न ही उस बेटी को। आज वह बेटी 25 साल की हो गई है और उसने अपने लिए एक योग्य जीवनसाथी भी चुना है, वह उसके साथ अपनी जिंदगी के ख्वाब सजाए बैठी है, अब न तो दहेज का कोई रोड़ा होगा और न ही कोई सामाजिक बेड़िया होंगी। उसकी शादी हो चुकी है, और वह भी मां का सुख पाना चाहती है, लेकिन उसकी पहली ख्वाहिश एक बेटा न होकर बेटी की मां बनना है, क्योंकि वह स्वच्छंदता की वह उड़ान देख चुकी थी, जो उसने स्वयं उड़ी थी। हालात बदल गए थे, अब यहां बेटियां ईश्वर का वरदान माने जाने लगा था। सब कुछ अच्छा था। मगर रुकिए... यह एक महज कोरी कल्पना है, जो अभी पूरी होती नजर नहीं आती, यह 21वीं सदी है, यहां बेटियों का हाल आज भी वही पुराना है, वह परेशान है, वह बेबस है, वह लाचार है, क्या कभी उसके हालात बदल पाएंगे। हर कदम पर मिलने वाली चुनौती कभी समाप्त हो पाएगी। शायद वह कल्पना ख्वाब ही बनकर रहेगी, क्योंकि इसके लिए कोई भी ठोस जमीन तैयार नहीं दिखाई दे रही है, हर तरफ उसके लिए दलदल ही दलदल है और इस स्थिति से निपटने में उसे हम अक्षम कर दे देते हैं, इस परेशानी से कैसे निजात् मिलेगी, शायद कोई नहीं जानता है। हम क्यों नहीं उबर पा रहे हैं अपनी उसी ढकियानूसी मानसिकता से, जो सदियों पहले से चली आ रही है, उसमें ही हम अपनी आगे की जिंदगी को बिताना चाहते हैं, यह समस्या है हमारी, यह हमारी लाचारी है और अगर उस बेटी को आज देखा जाए तो आंखें भर आती हैं, क्योंकि उसके इन हालातों के जिम्मेदार कोई और नहीं बल्कि हम हैं।

Saturday, July 17, 2010

इन्हें तो फांसी पर चढ़ा दो...



हिंदुत्व का डंका पीटते रहते हंैं, शांति स्थापना के लिए ये लोग मारकाट मचाते हैं, किसी के ऊपर दादागिरी दिखाना इनका शौक बन गया है, लोगों से पैसा वसूली, मकान खाली करवाना, चाकू बाजी करना जैसे ढेरो अपराध आरएसएस के कार्यकर्ता कर रहे हैं, और ऊपर से जवाब आता है कि यह प्रदर्शन शांति पूर्वक किया गया, वाह क्या जवाब है, मीडिया ने इनके कुकर्मों और अराजकता को सरेआम किया तो ये खौल उठे, सच्चाई को जो हजम कर जाए, उसे ही मानव की श्रेणी में रखा जाना चाहिए, मगर यहां तो कुछ और ही चल रहा है। तीज त्योहारों पर धर्म और संस्कृति के नाम पर सरेराह लोगों को पीटना, गुंडागर्दी करना इनका पेशा हो गया है, आरएसएस पूरी तरह से तानाशाही की ओर चला गया है तो आखिर ये लोग हमारी संस्कृति के संरक्षक कैसे हो सकते हैं। ये तो खुद उसका बंटाढार करने में तुले हुए हैं, तो उन्हें हम अपना कैसे मान लेें। मीडिया की सच्चाई से ये इतने तिलमिला गए कि उस पर प्राण घातक हमला ही कर बैठे, जिसका वीडियो यह बता रहा है कि इनमें कितनी उग्रता थी। और इनके कर्ताधर्ता इसे शांति पूर्वक प्रदर्शन बता रहे हैं। निश्चय ही इस संगठन को नक्सलवाद से कम नहीं माना जाना चाहिए और सरकार को इस पर पाबंदी लगा देनी चाहिए, क्योंकि यह रौब अगर अभी नकारा गया या इस पर ध्यान नहीं दिया गया तो निश्चय ही यह समस्या को और अधिक विकराल कर देगा, तब यह एक बड़ी समस्या के रूप में मौजूद रहेगा और इसका भुगतान देश की जनता ही करेगी। फिलहाल तो सरकार को इस कसौटी पर पूरी तरह से खरा उतरना चाहिए, क्योंकि जिस तरह से इन्होंने देश का अपनी जागीर समझकर उस पर मनमानी कर रहे हैं, उस पर काबू पाने की आवश्यकता है। अगर अभी कोई प्रत्यन नहीं किया गया तो यह सरकार के साथ देश की नाकामी होगी। जिस तरह से राज ठाकरे ने महाराष्ट्र में अपनी तानाशाही चला रखी है, उसी तर्ज पर संघ भी आ रहा है, आखिर ये हैं कोैन, और इन्हें अधिकार क्या है कि देश की संस्कृति बचाए, छुटभैये नेता बनकर अपनी ताकत दिखाते हैं। ये लोग अपने फैसलों से आम जनता को त्रस्त कर देते हैं और वह बेचारी अकेली होती है, इसलिए ये लोग उसे दबा देते हैं। यहां दिक्कत यह भी है कि ये लोग युवाओं को भटका रहे हैं , उन्हें संघ में आकर उनसे गुंडागर्दी करवाई जा रही है। हालांकि समझदार और पढ़े-लिखे युवा इसमें भागीदारी नहीं निभाते, लेकिन जो कम पढ़े-लिखे हैं और बेरोजगार हैं, वो इनके नुमाइंदे बन जाते हैं, इस विकट परिस्थिति से देश को बचाना होगा, साथ ही इसमें परिवार के लोगों की भी महत्वपूर्ण भूमिका बनती है, उन्हें अपने घर के सपूतों को इसमें जाने से रोकना चाहिए, क्योंकि यहां कोई भविष्य नहीं है, अगर आप उन्हें नहीं रोकेंगे तो आखिर कौन रोकेगा और अगर यहां नहीं रोका गया तो निश्चय ही इनकी ताकत बढ़ती जाएगी और जब ताकत का मद चढ़ता है तो विध्वंस होता है। इसलिए आरएसएस की तानाशाही को यहीं रोकना होगा, वरना यह देश के लिए घातक सिद्ध होगा। सरकार को भी अपनी ताकत दिखानी होगी और इन लोगों को सख्त से सख्त सजा देनी होगी, अन्यथा ये लोग हमें शांति और आजादी से जीने नहीं देंगे।