Saturday, August 14, 2010

क्या आजाद हैं और क्या आजादी भी है?



कुर्बानी की वो गाथाएं जो हमने हमारे पूर्वजोें से सुनी हैं, वो गाथाएं जो आज भी हमारे रोंगटे खड़ी कर देती हैं, दिल को मचलने और दिमाग में जुनून पैदा कर देती हैं, जब सुनते हैं तो हमारा भी खून खौल जाता है, मन मचल जाता है, लगता है कि काश हम भी तब होते तो हमारी आजादी के लिए एक कतरा जरूर देते। तब भारत मां का ऋण जो हम पर आज है, उसे चुकाना हमारा फर्ज रहता..वह देशभक्ति का जुनून और वह समय ही हमारी मन को जय हो का नारा दे देता है, लगता है कि हम भी गांधी के साथ उस सभा में नारे लगाते रहते, भगतसिंह के साथ संसद में बम फेंकते और हंसते-हंसते फांसी पर लटक जाते, वाह जन्मभूमि पर कुर्बान होने के लिए तो मिलता...मगर...मगर...मगर यह क्या? हमारी आजादी को हम हरगिज भुला बैठे हैं और जो विरासत हमें संभाल कर दी गई थी या कहें संभालने के लिए आज उसकी हालत बहुत बुरी हो गई है, इस सोने की चिड़िया को हमने कब का बेच दिया है, आखिर हम हमारा देश किस ओर जा रहा है, हमने तो कभी नहीं सोचा था कि आखिर ऐसा कुछ हो, लेकिन भ्रष्टाचार की धारा हरे रामा हरे कृष्णा के वेष में आ चुकी है, जिसे पहचानना भी मुश्किल है, कालिया नाग अब यमुना में नहीं है, बल्कि लोगों के मनों में बैठा हुआ है और वहां से वार कर रहा है, इसलिए उसे मिटाया भी नहीं जा सकता है। हम तो बदलते युग की पहचान बनना चाहते थे, हम आजाद परिंदे थे और ऊंची उड़ान ही हमारा लक्ष्य था, लेकिन वह धरा ही भसक गई, क्योंकि उसकी जमीन में भ्रष्ट माटी लगा दी गई थी, जिसका धसकना तो लाजमी ही था। अब वह धसक गई है तो इसने देश की बुनियाद को ही हिलाकर रख दिया है। यह वक्त है सियासत का, यहां सियासत ने जो सितम ढाए हैं, उसने उन लोगों की कुर्बानी को जाया कर दिया है, जिसने देश के लिए न जाने कितने त्याग किए थे। मगर सियासतो के सौदागरों ने अपनी सत्ता के लालच से इसे मट्टी पलीद कर दिया है, आज अगर सबसे ज्यादा बू आती है तो इन्हीं सफेद कुर्तों वालों के पास से आती है, जिनके पास पूरा पॉवर है और उस पॉवर का इस्तेमाल इन गलत हाथों में है, आखिर क्यों यह देश के साथ खिलवाड़ क्यों किया जा रहा है, उसके साथ छलात्कार और बलात्कार किया जा रहा है, इसकी दुर्दशा दुर्दांत होती जा रही है, लेकिन इसकी चिंता किसी को नहीं है, गद्दारों की कमी नहीं है, इनके कारण ही देश के सितारे गर्दिश में चले गए हैं। आज अमेरिका, चीन, रूस, जापान हम पर राज कर रहे हैं, हम उनसे कोसों दूर हैं। हमारा न तो कोई हिस्सा है और न ही कोई हैसियत...आज उनके सामने हमें भिक्षकों की भांति खड़े रहना पड़ता है, क्या यह आजादी है या फिर यह आजादी है कि हमारे यहां हर अमीर गरीब पर शासन चलाता है, हर बड़ा अधिकारी नियमों का उल्लंघन करता है। हर नेता जनता को धोखा देता है और वादों की एक कमजोर नींव खड़ी करता है और वह उसके हाथ में सत्ता आने के बाद जमींदोज हो जाती है। आईएस से लेकर रुटिन अधिकारी तक जाने वालों की हालत बहुत ही खराब है, हर कोई इस भ्रष्ट सरिता में डुबकियां मार रहा है, मगर किसी को कोई परवाह नहीं है क्योंकि अपना काम बनता, भाड़ में जाए जनता। आज यह सब देखकर इस आजादी को मनाने का दिल नहीं करता है, क्योंकि हम आजाद हैं आजादी हमारे पास है, इस पर शक हो रहा है, हर कोई तो हम पर शासन करने में जुटा है, कभी महंगाई तो कभी विकास के नाम पर हमें ठगा जा रहा है, बावजूद हम सहने में लगे हैं और लग रहा है कि हमारा खून सूख चुका है। तो कैसी है यह आजादी और आखिर क्यों हमें इसपर गर्व हो, क्योंकि यहां गर्व जैसी तो कोई बात ही नहीं दिखाई देती है। यह दर्द है, अगर यहां से ऐसा लग रहा है कि हम गुलाम हैं, आजाद भारत में गुलाम...।

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