Saturday, August 21, 2010

अमीरी के आगे गिड़गिड़ाती गरीबी


मेरी किस्मत में मेरी तकदीर लिखी है, लेकिन मेरा ही बस इस पर नहीं चलता...सचमुच यह जीवन की सबसे बड़ी सच्चाई है।
सदियों से गरीबी ने आदमी को जीने नहीं दिया है। वह युग हो या फिर यह युग। या फिर आने वाला युग । हर युग में यही दिखाई दे रहा है कि गरीब गरीबी के आगे गिड़गिड़ाता रहेगा, लेकिन वह इसकी एक न सुनेगी। हर अमीर आज चांद को छूने की बात करता है, लेकिन गरीब के पास जमीन पर रहने तक का बसेरा नहीं है। कुदरत भी न जाने क्या कहर बरसाता है, जिसमें न आदमी सिसक पाता है और न ही तड़प पाता है। दुनिया में न जाने कितने रंग हैं, जिसने जीवन को जहन्नुम बना दिया है। आखिर कब तक हम आश्रय की जिंदगी के मोहताज रहेंगे। कब तक यह खुरदुरी जमीन पर हमें रीते पांव दौड़ लगानी होगी। अब तो मुश्किल हो रहा है, क्योंकि पांव लहूलुहान हो गए हैं। क्या करें, कुछ समझ नहीं आता है, जिंदगी जीने के ख्वाब देखती है, लेकिन गरीबी है कि उस ख्वाब का कत्ल कर देती है। बचपन से इसने बहुत रुलाया, पहले मां बाप को, उनसे पहले दादा दादी को, इसके बाद अब मुझे रुला रही है। मैं जब से भी थोड़ा समझदार हुआ हूं, इस सेठ के आगे देखा है कि घुटने टेके और हाथ फैलाए ही खड़ा हुआ है। ऊपर से यह बेदर्द समाज, जो आदमी को नीचे ही रखना चाहता है, उसका भी तो कुछ किया नहीं जा सकता है। स्थिति गंभीर और विकट है, कौन बचाएगा इस रोग से, जो शरीर को अंदर ही अंदर तोड़ देता है। न तो जीने देता है और न ही मरने देता है। दो धारी जीवन हो जाता है, जिसके अंदर से बूंद-बूंद खून गिरता है। वह सिसकन बड़ी तड़पाती है, क्योंकि यह गरीबी भूख से मार देती है, कभी रोग से मार देती है, इनसे भी बच गए तो अमीरों के तलवों के नीचे मार डालती है। आखिर कैसे जिए, इस गरीबी में, क्योंकि इसकी सबसे बड़ी सहायक इसकी बहन महंगाई डायन है। उसका तो प्रलय सब दूर चल रहा है, उसने तो अमीरों को भी नहीं बख्शा है, लेकिन उनके पास लक्ष्मी की ताकत है, जो इस डायन का गला घोंट देती है। छीछालादर तो उन बेचारे गरीबों की हो जाती है, जिनके पास सिवाय बेबसी, लाचारी और आत्महत्या के अलावा कोई विकल्प मौजूद नहीं है। आखिर कब तक दुनिया में गरीबों को इस अग्निपरीक्षा से गुजरना होगा, कब तक हम सरक-सरक कर जिएंगे। मगर कुछ कर भी तो नहीं सकते, क्योंकि यह खाई तो बढ़ती जा रही है, कोई विकल्प गरीबी के आगे दिखाई नहीं देता है। जिंदगी की लीला यही अजगर, यही नागिन लील लेती है, और ऐसा जहर भर देती है कि जीवन भर उसे जीने नहीं देती है। परमाणु हमला तो फिर भी ठीक है, क्योंकि उसमें तो एक बार ही मरना पड़ता है, लेकिन इसमें तो पल-पल तिल-तिल कर तड़पना होता है, मरना होता है। गरीबों उठो, क्योंकि यहां कोई तुम्हारे लिए अवतार बनकर नहीं आएगा। सरकार और नेता तो भ्रष्टाचार की चादर ओढ़ कर कुंभकर्णी नींद सो गए हैं, उन्हें जगाने में तो युग निकल जाएंगे। अपने लिए तुम्हें ही करना होगा, क्योंकि अपने मरे ही स्वर्ग नसीब होता है। जब तक तुम आगे नहीं आओगे, डटकर इस गरीबी का सामना नहीं करोगे, यह तुम्हें अपनी गुलामी करवाती रहेगी, और तुम इसके सामने हथकड़ियों में जकड़े नजर आओगे। बस...अब ज्यादा सवाल नहीं, क्योंकि समय आ गया है, जब पेट न भरो, बल्कि गरीबी दूर करो। अगर यह कर लिया तो हम सदा के लिए मुक्त हो जाएंगे । किसी एक पीढ़ी को तो संघर्ष करना ही होगा, हमें विरासत में मिली गरीबी, लेकिन यह गरीबी को हटाया भी तो जा सकता है, इसका दम मिटाया भी तो जा सकता है । हर गरीब आज संघर्ष करे, सूरज के प्रकाश को भी रोका जा सकता है, बस हौसला होना चाहिए। इन वादियों और इस धरती से एक कसम लो कि अब गरीबी के आगे गिड़गिड़ाएंगे नहीं, बल्कि डटकर इसका मुकाबला करेंगे।

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