Thursday, July 1, 2010

इससे तो अच्छा होता कि भ्रुण में ही गला घोंट देते



हम खुद को श्रेष्ठ कहते हैं, हमारे पास हर वो चीज है, जो मानवता की मिसाल बनाई जा सकती है, लेकिन यह सब हम स्वार्थवश की करते दिखाई देते हैं, मतलब हमारी असली जिंदगी तो कुछ और ही रहती है, दोहरा जीवन जीने में लगता है हमें मजा आता है, हम बेटियों को आधी आबादी कहकर उन्हें बराबर का अधिकार देते हैं, लेकिन जब उन्हें वास्तव में अधिकार देने की बात आती है, तो हमारे कदम पीछे सरक जाते हैं। बेटी...जिसका नाम सुनते ही मां-बाप के जीवन की रौनक खत्म हो जाती है, वह मां जो कल स्वयं बेटी थी, वह सास जो खुद एक औरत है, आज वही उसकी कातिल बन जाती है। तो क्या दोष है उसका, उसकी मानसिकता भी इस समाज में बदल गई है, कहीं न कहीं समाज में मौजूद हालात इसके लिए जिम्मेदार हैं। एक बेटी को इस समाज मेें जगह-जगह पर खतरा है, हर कदम पर उसे जीने के लिए संघर्ष करना पड़ता है। इसी संघर्ष की एक छोटी सी कहानी मैं बताना चाहूंगा...उसका नाम था सोनू। जब वह सात साल की हुई तो पता चला कि माता पिता उसे गर्भ में ही मार देना चाहते थे। एक दिन झल्लाहट में उसकी दादी के मुंह से उसने ऐसा सुन लिया था। तब उसे हालांकि इसके बारे में न तो ज्यादा समझ आया और न ही उसने इस बारे में अधिक ध्यान दिया। बचपन से ही उसके तीन साल छोटे भाई की अपेक्षा कम महत्व मिलता था। घरवाले उसे खेलने नहीं जाने देते थे। दिनभर काम करवाते थे, अगर उसका मन कभी भाई के साथ खेलने को करता तो उसे मना कर दिया जाता था। वह अंदर ही अंदर सिसक कर रह जाती, मगर कुछ कर नहीें पाती। दिनभर काम करती, शाम को पिता की दो बातें भी सुनती। अब तो सोनू स्कूल जाने लायक हो गई थी। किसी तरह माता-पिता ने उसे स्कूल भेजा, लेकिन न तो उसकी कभी पूरी ड्रेस रहती थी और न ही कभी पूरी किताबें । लेकिन बेचारी वह पढ़ने में अच्छी थी और हर बार अच्छे मार्क्स से पास भी होती थी। हर दिन उसे हर बात के लिए प्रताड़ित किया जाता था। अगर गलती घरवालों से होती थी तो भी उसे ही जिम्मेदार ठहराया जाता था। पर बेचारी वह कुछ नहीं कर पाती। जैसे-जैसे वह बड़ी होती गई, वैसे-वैसे न जाने किस अंधेरी खाई में उसका मन सिसकता रहा। मगर उसकी सुनने वाला कोई नहीं था। लगभग 17 साल की वह हो गई थी तो घरवालों ने उसे पढ़ने से रोक दिया, जबकि वह पढ़ाई करना चाहती थी। उसकी पढ़ाई बंद कराकर घरवाले जल्द से जल्द उसके हाथ पीले करने की जुगाड़ ढूंढ़ने लगे। एक दिन उसका रिश्ता तय हो गया। वह 17 साल की थी और उसके दूल्हे की उम्र 35 साल, जिसकी पहली बीवी गुजर चुकी थी। मगर इस पर भी उसने ऐतराज नहीं जताया, क्योंकि घरवालों की मर्जी थी। इसलिए इस खून के घूंट को भी वह चुपचाप पी गई, बिना विरोध किए। ससुराल चली गई। उसे लगा कि शायद ससुराल जाकर उसे सारी चीजों से मुक्ति मिल जाएगी, मगर ऐसा नहीं हुआ, क्योंकि ससुराल में पहले ही दिन जब उसने कदम रखा तो उसके पैरों के नीचे से जमीन ही खिसक गई। उसके दो बेटे और एक बेटी। पहली बीवी से। ससुराल में वह पत्नी और बहू तो बाद में बनी, पहले एक मां बन गई। इस जहर को भी उसने खुशी-खुशी पी लिया और पति की सेवा और बच्चों की परवरिश को अपना जीवन मान लिया। एक साल बीत गया, अभी तक उसके पति से उसे स्नेह नहीं मिल पाया था। इसके बावजूद यह बात उसने परिवार और समाज में जाहिर होने नहीं दी थी। इस बात को लेकर पति झल्लाता और कई बार सोनू की पिटाई भी करता था। रात- रात भर वह तकिए में अपने आंसू बहाया करती थी। वह तकिया कई बार गीला हुआ, उसके दु:ख की कहानी वह तकिया ही बता सकता था और कभी-कभी लगता है कि सोनू के दु:ख से वह भी रो पड़ता था। मगर उसकी सिसकियां और किसी को सुनाई नहीं देती थी। दिन गुजरते गए, लेकिन सोनू के आंसू बढ़ते ही जा रहे थे। पल-पल उसे मौत मार रही थी। कभी पति की पिटाई तो कभी सास के ताने तो कभी ससुर की अंगड़ाई का भार उसे ही चुकाना पड़ रहा था। एक दिन तो हद ही हो गई, सोनू के छोटे देवर साहब ने उसकी इज्जत पर हाथ साफ कर लिया। उस दिन भी आरोप सोनू पर ही डाल दिया गया और उसे मारने के लिए ससुरालवालों ने पूरी योजना बनाई। उन्होंने उसे जलाने के लिए प्लान तैयार किया। घरवालों ने उसका दरवाजा बाहर से लगा दिया और बाहर से पेट्रोल डालकर आग लगा दी। सोनू ने बहादुरी दिखाते हुए खिड़की से बाहर कूद गई...सोनू बिलख पड़ी और कहने लगी कि अच्छा होता अगर मेरा गला भ्रुण में ही घोंट दिया होता। मां तूने ऐसा क्यों नहीं किया, मुझे यह जिंदगी क्यों दी, आखिर क्यों???????? सोनू का सवाल वाजिब है, हम भु्रण में हत्याओं को रोकने की बात करते हैं, लेकिन कभी यह सोचा है कि आखिर भ्रुण में बेटियोें का कत्ल क्यों किया जाता है, शायद इसलिए कि इस समाज में आकर उनका बार-बार कत्ल न हो, उन्हें जहन्नुम जैसी जिंदगी न जीनी पड़े। यह एक सोनू की कहानी नहीं है, बल्कि इस देश की हर लड़की की कहानी है, और हमारा मिशन भ्रुण हत्या रोकने का है, वह तब तक बंद नहीं होगा, जब तक यह समाज नहीं सुधरेगा, जब तक बेटियों पर बर्बरता नहीं रुकेगी। अगर समाज में और समाज के प्राणियों की मानसिकता को अगर हम बदल दें तो भ्रुण हत्या जैसी कोई समस्या नहीं होगी, इसलिए परिणाम पर सीधे मत आओ, पहले समस्या की जड़ को समाप्त करो, समस्या अपने आप समाप्त हो जाएगी। खुद बदलो, जग बदल जाएगा। बेटियों के लिए संकल्पि होकर अपनी मानसिकता को बदल दो, सच मानों देश की तकदीर ही बदल जाएगी। बेटी को पल-पल मरना होता है, इससे बचाने के लिए उसे पलने में आने से पहले ही मार दिया जाता है, और ये कातिल उसके अपने ही होते हैं, काश! इस समाज की सोच बदल जाए, वह बेटियों को उनकी पूरी आजादी दे, इसमें हम बेटों को भी भूमिका निभानी होगी, तभी यह मिशन सफल होगा। आखिर इन्हें भी तो जीने का अधिकार है, और अब इन्हें जीने दो?

2 comments:

  1. आखिर इन्हें भी तो जीने का अधिकार है, और अब इन्हें जीने दो?
    बहुत अच्‍छा लिखा है !!

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  2. इन्हें भी तो जीने का अधिकार है-यह सभी को समझना होगा...

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