Tuesday, May 11, 2010

मुहब्बत में कब तक मौत?



हमने इश्क किया है, कर तो लिया है, अब क्या होगा, यह समाज और यह दुनिया हमें जीने नहीं देगी, तो चलो आज हम हमारे प्यार को अमर कर दें, साथ जी न सके तो साथ मर ही जाते हैं... शायद हमारे जाने के बाद ही यह दुनिया हमारी मुहब्बत की पाकिजगी को महसूस करेगी, तब इसका दिल पिघल जाएगा और फिर किसी मुहब्बत का दम नहीं घुटेगा..., यह है हमारे समाज की हकीकत, जहां हर प्यार करने वाले को अपनी जिंदगी दांव पर लगानी पड़ती है।
मुहब्बत की है, तो मौत क्यों मिले, आखिर इश्क का अंत मौत तो नहीं हो सकता, क्योंकि यह पाक है भक्ति की तरह, यह पवित्र है आत्मा की तरह, यह निश्छल है गंगा की तरह, यह विशाल है समुंदर की तरह, यह बड़ा है आसमान की तरह, इसमें धैर्य है धरती की तरह... तो आखिर क्यों लोग इसके दुश्मन बन बैठते हैं, क्यों जमाना इसके खिलाफ हो जाता है, आखिर इसका हक तो स्वयं भगवान ने भी दे रखा है, न तो पुराणों और न ही किसी धर्म में लिखा है कि इश्क गुनाह है, स्वयं भगवान ने भी इसे किया है, तो क्या आज इसे गुनाह नहीं समझा जा रहा है, फिर प्यार तो प्यार है, वह किसी से भी हो सकता है, किसी ने सच ही कहा है कि इश्क किया है तो इंतजार और मौत के लिए हमेशा तैयार रहो, मगर हम सच्चाई के धरातल पर आकर स्वयं को इससे रूबरू क्यों नहीं करवाना चाहते हैं, हम क्यों उन्हीं पुरानी ढकोसली बातों और बेड़ियों में जकड़े रहते हैं। सदियां गुजर गई , युग बदल गए, मगर प्यार की वही कहानी आज भी दोहराई जा सकी। आखिर क्यों... हरियाणा के दो जोड़ों को पंचायत ने महज इसलिए सजा दे दी, क्योंकि वो अलग-अलग जाति के थे। वहीं कानपुर के प्रेमियों को अपनी जीवन लीला इसलिए समाप्त करनी पड़ी, क्योंकि इसके विरोध में उनके घरवाले थे। उन्होंने सोचा साथ जी न सके तो कम से कम साथ मर ही जाएंगे। समाज का यह एक रूप बेहद कुरूप है, जो बातें तो अमेरिका और चांद को देखकर करता है, और जब उनकी तरह अमल करने की बारी आती है तो पीछे की पतली गली से निकल जाता है। क्यों यह दुश्मनी खत्म नहीं हो रही है, आखिर क्यों? इन प्रेमियों को अपनी जान देनी पड़ रही है , इसका न तो समाज के पास उत्तर है और न ही उन मासूम प्रेमियों के पास जो चाहते हैं जीना, उसके साथ जो उसका जीवन भर साथ निभाता है, तो इसमें बुराई भी क्या है, जिंदगी उनकी है, जीने का अधिकार उन्हें भी है तो जीवन जब साथ गुजारना हो तो प्यार भी मर्जी का ही हो तो बेहतर होता है, मगर यहां तो समझौतों का दामन थामकर अपनी संवेदनाओं की बलि चढ़ानी पड़ती है। भावनाओं और मुहब्बत को यहां दुनिया में पाप समझा जाता है, और ये वो लोग समझते हैं, जो खुद भी इसके भागीदार हो चले हैं , मगर झूठे आडंबर और ढकोसले समाज के चलते उन्हें भी न चाहते हुए भी इसका दुश्मन बनना पड़ता है। तो कब होगा इनका अंत...शायद कभी नहीं, हम क्यों इनके भागीदार बनते हैं, कोठों पर जाने से कभी नहीं हिचकते, लेकिन दो लोग अपना जीवन जीना चाहते हैं, तो उन्हें कोई जीने नहीं देता। कानपुर में उन दोनों प्रेमियों की तरह न जाने कितनी बार मोहब्बत का दम घोटा गया है, लेकिन यह अमृत की तरह है, जो कभी मिटती नहीं। एक आशिक को दबाया तो कल कोई दूसरा आशिक भी पैदा हो रहा है। कब तक इन्हीं ढकियानूसी बातों और बेड़ियों में हम अटके रहेंगे, क्यों न उस संसार को जीने दिया जाए, जो मुहब्बत की पाकिजगी महसूस करना चाहता है, उसे जीना चाहता है, एक दिन नहीं , बल्कि ताउम्र, तो फिर हम दुश्मन क्यों बने, वह भी उनके, जो हमारे जिगर के टुकड़े होते हैं, एक बार बड़ा दिल कर इन्हें अपना कर तो देखो, जिंदगी कितनी खुशनुमा हो जाएगी, फिर न तो तुम्हारा दिल जलेगा और न ही इन्हें मुहब्बत के बदले मौत को अपनाना पड़ेगा।

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