Wednesday, December 22, 2010

बयानों से तूफान नहीं आएगा


यह बात हम नहीं कह रहे हैं, बल्कि बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी कर रहे हैं। एक बार फिर बयानों को की आंच से चाय को उबाल रहे हैं, सोच रहे हैं कि इसमें बिना दूध डाले इसे सफेद कर लिया जाएगा, लेकिन यह सिर्फ कोरी कल्पना है, क्योंकि जब तक चाय में दूध नहीं डालेंगे वह काली ही रहेगी। आरोप का आडंबर कितना ही खड़ा कर लो, जब जनता का दरबार सजता है, तो वह सच्चाई उजागर कर ही देता है। यहां नितिन भले ही कितनी ही निर्लज्जता साबित कर दें, कांग्रेस को चोर कह दें या खूनी। जनता तो उनके बयानों को हवा ही मानेगी। क्योंकि बीजेपी सिवाय आरोप लगाने के और कुछ भी नहीं कर रही है। अगर भ्रष्टाचार पर कांग्रेस को वह घेर रही है तो इसके पीछे कौन दोषी है, यह पूरी जांच की जाए। सवाल यह उठता है कि अगर टूजी में कांग्रेस सरकार फंसी है तो आग के छींटे एनडीए सरकार तक भी गए हैं और जब तेजाब के छींटे जाते हैं तो यह सिर्फ छींटाकशी तक ही सीमित नहीं रहते हैं, बल्कि जहां भी गिरते हैं, वहीं से मांस लेकर बाहर आ जाते हैं। बयानों की बाढ़ एक बार फिर लाई जा रही है और इस कल्पना की बाढ़ में बीजेपी कांग्रेस को डुबोना चाह रहेगी, लेकिन होगा बिलकुल उलट, जब बाढ़ आएगी तो वह यह नहीं देखेगी कि सामने कांग्रेस है या फिर भाजपा। दोनों इसमें बह जाएंगे, या फिर वही बचेगा जिसका किला मजबूत होगा। अभी की स्थिति में देखा जाए तो कांग्रेस का किला बहुत ही मजबूत दिखाई दे रहा है, बीजेपी तो सिकंदरों से परेशान है, यहां पर हर कोई हॉफ राबिनहुड और तीस मार खान बनने की जुगत में भिड़ा हुआ है। आखिर कब तक इस डंडे से रेलगाड़ी को हांकने की कोशिश की जाएगी। आडवाणी भी उबल रहे हैं, आखिर करते क्या? बेचारे बुजुर्ग नेता का ख्वाब पूरा होता नजर नहीं आ रहा है, सोचा था प्रधानमंत्री बन जाएंगे, लेकिन जिस तरह से पार्टी को हार की हताशा मिली है, वह उससे अभी तक उबर ही नहीं पाए हैं, हां आज कुछ बयान देखकर उन्होंने जताया है कि मुझे कम मत आंकों, मेरे अंदर अभी भी आग है, मैं अभी भी बूढ़ा नहीं हुआ हूं। जो कुछ कहना था उन्होंने भी ऊलजलूल कहा, लेकिन अंत में फैसला तो जनता जर्नादन के हाथ में ही है। और आज की जनता काफी जागरूक हो गई है, वह किसी भी कीमत में हरल्लों और मुंह के तीखों को नहीं रखेगी, हां उसे मीठों से भी नफरत है, लेकिन इतनी भी नहीं। खैर जो हो रहा है वह किसी हादसे से कम नहीं है, क्योंकि पूरी तरह से विपक्ष अपने कर्त्तव्यों से विमुख हो गया है, वह सिर्फ सत्तासीन होना चाहता है और इसके लिए वह सत्तादल को बदनाम करने की पुरजोर कोशिश कर रहा है। कौन इस खेल में हारेगा और कौन जीतेगा, इसमें तो अभी फैसला आना बाकी है, लेकिन बीजेपी जिस तरह से यह कारनामे करने में जुटी है, वह अपवाद साबित हो सकता है, क्योंकि आज का युवा सिर्फ विकास की राह पर चलना जानता है, उसी की बातें सुनता है, जो इससे हटकर बातें करता है, वह लोगों को नहीं भाता है। बहुत हो गया भ्रष्टाचार, महंगाई या अन्य मुद्दे, अब सब बोर हो गए हैं, कुछ नया चाहिए। ये दिल मांगे मोर...लेकिन गोलमोल कुछ नहीं चलेगा, गोलमाल से तो लोग सिर्फ हंसते हैं, अब तो उन्हें तथ्यपरख चीज चाहिए, और अगर ऐसा देने में बीजेपी असमर्थ साबित होती है तो निश्चय ही उसके हाल पुन: वही हो जाएंगे। जिस तरह से आम आदमी अपनी समस्याओं फंसा हुआ है, वो नेताओं के नाम से ही चिढ़ने लगता है, और इनके गंभीर भाषण उसे सोचने पर मजबूर नहीं करते, बल्कि उसे हंसी दिलाते हैं। वह साथियों के साथ खूब ठहाके लगाता है। क्योंकि आजकल तो बयान सिर्फ ठहाके लेने के लिए ही बचे हैं।

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